पथ के साथी

Sunday, May 13, 2018

821

मातृदिवस पर हार्दिक शुभकामनाओं के साथ दो रचनाएँ - 


      1
 माँ की खुशबू 

-डॉ. भावना कुँअर

आज एक अजीब -सी बेचैनी थी मन में...
जाने  क्यों  बार-बार
आज भटक रहा था मन
रह-रहकर माँ  क्यों  याद रही थी...
पिछले बरस ही तो आई थी  मेरे पास
दिनभर जाने क्या-क्या करती...
कभी खाली ही नहीं रहती...
जब मैं ऑफिस से आती
खुल जाता हमारी यादों का पिटारा...
और रात ढले हौले-हौले बन्द होता
घर का हर कोना महकता रहता...
माँ की खुशबू से
बॉलकनी में जाते वक्त माँ का हाथ हिलाना...
आने से पहले यूँ खड़े-खड़े इन्तज़ार करना...
आज मन दुखी है,माँ को याद करता है...
मैं बैठी हूँ सात संमदर पार
ढूँढती हूँ उस खुशबू को...
जो दब गई है कहीं धूल में
झाड़ती हूँ धूल
और रख लेती हूँ खुशबू को सहेजकर
रसोई में खोजती हूँ कुछ डिब्बों में...
खुशी से बाछें खिल जाती हैं...
माँ के हाथों से बने कचरी और पापड़ पाकर
चूल्हे पर जल्दी-जल्दी भूनती हूँ
तभी दिख जाती है माँ की पसन्द की चाय...
उन्हीं की तरह बनाती हूँ छोटे से भगोने में
खूब पका-पका कर
अब बैठ जाती हूँ, चाय की चुस्की लेती हूँ
कचरी पाप खाती हूँ
पर जाने  क्यों  होठों तक आते ही...
सील जाती है कचरी
और नमक भी जाने  क्यों  तेज -सा लगता है
कुछ सीली-सीली, कुछ गीली-गीली कचरी...
चाय की चुस्की या फिर दबी-दबी सिसकी...
सूनी बॉलकनी, सूना घर...
रसोई में बसी माँ के खाने की खुशबू आज भी है...
और आज भी है इन्तजार...
अलगनी पर टगें कपड़ों को...
तहाने का
आज भी शीशे पर चिपकी बिन्दी को...
है इन्तज़ार उन हाथों का
मेरी  नन्ही  चिरैया को है इन्तज़ार...
उन मीठी-मीठी बातों का
मैं सब यादों को समेटकर...
माँ से मिलने के दिन
लग जाती हूँ उँगलियों पर गिनने...
     2
     माँ
-शशि पाधा

जीवन की क्यारी में महकी 
मन चन्दन सुवास सी 
माँ ही देहरी माँ ही मंदिर 
माँ निष्ठा विश्वास सी|

माँ ही छाया, माँ ही माया 
माँ माथे की रेख में 
माँ ही गंगा, माँ ही काशी 
माँ वेदों के लेख में 
रोम रोम में सिरहन जैसी
बसती देह में श्वास सी|

सब प्रश्नों के उत्तर तुझ में 
सब उलझन की सुलझन तू 
संस्कारों की तू ही गठरी 
तू ही चिन्तन, मंथन तू 

माँ संझा की शीत चाँदनी 
ऊषा के उजास सी|

ज्ञान कोष का पहला अक्षर
सुर लहरी की तान तू   
घी मिश्री की चूरी तू ही
मेरी तो पहचान तू 
तू अँखियों की नील–झील में 
तू अधरों के हास सी |

तू तो हर पल संग ही रहती 
फिर क्यूँ तुमको याद करूँ 
मन दर्पण से तू ही झाँके
व्यर्थ ही विवाद करूँ 
    
तेरे जैसी लोग कहें पर  
मैं तेरा आभास सी

शशि पाधा 
  


Friday, May 4, 2018

820


रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
 1-प्रतिध्वनित

प्रतिध्वनित
पल -प्रतिपल
हूक तेरी घाटियों में
टेरती मुझको।
और सब सुधियाँ
मधुरता पान करके
सुनसान पथ में
हेरती मुझको।
रोज़ खुलते
खोखले सम्बन्ध
मेरे सामने,
कौन आता
 हाथ मेरा थामने!
बस तुम्हीं ,
जो हर घड़ी
सोचते मुझको;
बस तुम्हीं
अनुगूँज बन जो
खोजते मुझको।
मैं मिलूँगा एक दिन
फिर से तुम्हें
मैं खिलूँगा
उर उपवन में तुम्हारे
और खुशबू बन
सरस प्राणों को करूँगा
आत्मा बन मुझे
रहना तुम्हीं में है
मैं तुम्हारे प्राण का हिस्सा
दूर रहकर भी
उजाले  द्वार पर
तेरे धरूँगा।
[4 मई 2018]
-0-
मुक्तक
इस तरह कसकर तुम्हें सीने से लगा लूँ।
कि तेरे सभी दुख मैं सीने में छुपा लूँ ।
तेरे कोमल पाँवों में कभी कुछ न चुभे 
आगे तुमसे चलूँ , मैं सब शूल हटा लूँ ।
-०-
1-निशान

शिलाओं ने जल को
जीभर पटका
बार- बार पछाड़ा
कई बार लताड़ा,
वह खिलखिलाया
तभी तो उनको
चूर -चूर कर पाया
टूटा नहीं जल
शिलाओं पर अपने
निशान छोड़ आया।
-0-
2-थिरकन

घर के हर कोने में
थिरकती ,नाचती
गाती ,गुनगुनाती
उछलती थी गुड़िया।
स्कूल क्या गई
ऐसा पाठ पढ़ाया
अनुशासन सिखाया
सब भूल गई गुड़िया
दूर कहीं
उमंग खो गईं।
-0-
3-पत्थर

बनों पत्थर
देखो न छुपकर
कि कौन क्या कर रहा
फूल को न मारो
अगर गिर गए
तो टूट  जाओगे
फूल का क्या
बिखर भी गया तो
सुरभि लुटाएगा,
बीज बन बिखरा तो
फूल बन जाएगा
और पत्थर?
न बीज बनता
न खुशबू लुटाता
बस टूट- टूट जाता।
-0-
4-पानी

पानी रोता नहीं,
तुम्हारी आँखों में छलका
बहुत कुछ कह गया
अधरों पर उतरा
रस बन बह गया
बन गया लाज
सब कुछ सह गया
बना जो उमंग,
 तो माना नहीं वह
हृदय में तुम्हारे
बना प्यार निर्मल
और वहीं रह गया।
-0-(मई 3, 2018)
[ चित्र -गूगल  से साभार ]


Sunday, April 29, 2018

819


कमला निखुर्पा
1
जब-जब बिखरा है नीम  अँधेरा,
तेरे नेह से भरा  मेरे नैनों का दिया।
मधुर-मधुर जली यादों की बाती ,
जगमग हुई  मन- देहरी।
2
भली-भली- सी
गुलाबी कली
खिलने चली
संग हवा के
महकी-झूमी
पंख- पंखुड़ी लगा
उड़ने चली
छुए जो भंवर
काँपी-सिहरी
3
झील- दर्पण 
बादलों के ओट से
निहारता  रहा
खुद को रात भर चाँद
सूरज को देख अब आई है लाज
उड़ा-उड़ा है रंग आज  
4
था बहुत बड़ा शून्य
मेरे अस्तित्व के संग  ,
समेटा तुमने जो अंक में अपने ,
अनमोल होने का एहसास हो गया ।
5
‘विस्मय’ के संग
खड़ी थी जिंदगी
जाने कितने ‘प्रश्नचिह्नों’ से घिरी
खोजती हर सवाल का जवाब
ढूँढती रही
नन्हा-सा ‘अल्प विराम’
पर हर बार घिरी ‘उद्धरणों’ से
तो अपने ही ‘कोष्ठकों’  में बंद हो गई
लगा के ‘पूर्ण विराम’।
6
एक पल
देता सब कुछ बदल
क्षण में स्वर्ग सजे
पल में नरक रचे
बिताए कैसे धरती
वो एक पल
7
डरी- सहमी हैं
भेड़ -सी मासूम बेटियाँ
जाने कब कोई भेड़िया
नोच ले बोटियाँ
दहशत में माँएँ
काश कि कोख में छुप जाएँ  
ये नन्हीं सी गुड़िया।
8
सुबह से ही
आसमान में  मंडरा रहे हैं
चीलों के झुण्ड
जरूर कहीं किसी चिरैया के
घायल हैं पंख ।
9
वर्तमान की गोद में
नन्हा भविष्य लहूलुहान
अतीत फिर भी महान ।
10
चलती कलम
वर्तनी की त्रुटि
लाल सियाही का गोला
सुधार देती है इमला बच्चों का  
चलती जुबान की गलती
कभी होगी गोलबंद ?
-०- प्राचार्या  केन्द्रीय विद्यालय पिथौरागढ़ ( उत्तराखंड)