पथ के साथी

Friday, September 29, 2017

762


ज्योत्स्ना प्रदीप
1-शैलपुत्री

शैलपुत्री के रूप में पूजित
वृषभ हुई सवार।
कमल विराजे ,पापनाशिनी  
सुन लो ना पुकार।।

अपमान पति का सह न पाईं 
किया  खुद का दाह।
शिव की प्रिया बनीं तुम फिर से
यही थी चिर चाह।।

पार्वती बनकर तुम आईं 
दुहिता शैलराज।
शिव को पाया जप- तप से माँ
करो पूर्ण काज।

माँ की महिमा बड़ी अनोखी
सागर-सा हिलोर।
माता की करूणा का लोगों 
कहीं ओर न छोर।
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2-ब्रह्मचारिणी


ब्रह्मचारिणी माँ का मिलकर
करें हम आह्वान।
जीवन में संयम आता माँ 
करें हम प्रणाम।।

सूखे पात खाकर शंकरी 
सुखाई थी देह।
तुमसे बुद्धि का  दान मिले हैं 
प्यारी देह -नेह।।

शिव की साध बनी थी माता
जगत -मूलाधार।
पल -पल को कर देती पावन
जगत- पालनहार।

वरद -हाथ हो सर पर शिविका 
जले तेरी ज्योत।
जगमग करती माता जग को 
फैलाती खद्योत।।
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3-चंद्रघंटा


चंद्रघंटा-साधना पूजन 
शरद ऋतु शृंगार।
नवरात्रि के तृतीय दिवस में
करती हो उद्धार।

अस्त्रों - शस्त्रों से हो विभूषित
दृगों  में अंगार।
असुरों की संहारक आद्या
भू का हरे भार।।

देवी माँ से हो साधक को 
अलौकिक अहसास।
हर दुख में होती बालक के
सदा माता पास।

माँ -उपासना से  साधक का
सधे चक्र मणिपूर।
हर पल मन में वास करे ये
माँ न होए दूर ।।

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4- कूष्मांडा 


हे माता तुम अब आ जाओ
तुम्हीं मेरी आस ।।
सूरज सा है तेज तुम्हारा
रवि लोक है वास।।

करती शेर सवारी माता
सुनें जयजयकार।।
जग से बैर हटे रे माई
सभी  में हो  प्यार।।

वर दे दो तेजोमय माता 
बनें सबके काम।
नौ निधियों को देनेंवाली
जन्मों-जन्मों प्रणाम । ।

कंज,कमंडल ,गदा ,धनुष ले
देती अमिय -धार।।
तम बंधन से तुम्हीं निकालो
वंदन बारम्बार।।
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5-स्कंदमाता 


वरमुद्रा में शुभ्र वर्ण वाली,
करें सभी प्रणाम।
स्कंदमाता शाम्भवी हो  तुम,
करती हो कल्याण।।

तेरी साधना -आराधना
भर  दे घर- भण्डार।
नैनों से करुणा  की बहती
तेरे दृगों- धार।।

अनगिन किरणें काया -निकसे,
चमक रहा  ललाट।
दीन- हीन हैं हम पापी हैं,
जगत - बंधन काट।।

माँ के मानस आओ लोगों ,
होते हैं तल्लीन ।
इस माया से विलग पड़ी थी,
बिन जल तृषित मीन।।
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6-माँ कात्यायनी  

माँ कात्यायनी कमलालया
करूँ तेरा जाप।
श्री अंगों की आभा प्यारी
दूर हो संताप ।।

महिषासुर-कलुषित तन- मनका
तुमने अंत किया।
क्रोध- शोक से  भटके थे जो
मन को संत किया।।

सब  शत्रु - नाशिनी हो माता
तुम्हें है नमस्कार ।
शुभ छवि जो हृदय में विराजे
भागे अहंकार।।

हेम -कलेवर लोहित साड़ी
हाथों में कटार।
पोर-पोर  से बहती आभा 
घनप्रिया की धार ।


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7-कालरात्रि 


हे  कालरात्रि काली  माता,
काल तेरा ग्रास।
काया काली पर दीपित है,
हृदय में मधुमास।।

क्रिया हीन हूँ ,तेरे वर से 
करें कर्म महान।
बुद्धिहीन, यश हीन हूँ माता
दे दो अमिय - दान ।।

विजयशालिनी ,मोक्षप्रदा  माँ 
तेरे अंशभूत।
शत्रु नाशकर परम गति पाते 
तेरे ही कपूत।।

रौद्रमुखी हो भद्रकाली माँ
कंठ माल -कपाल।
खुले केशों में विकट रातें 
जीभ लोहित ,लाल।।

रौद्री, घुमोरना ,कपालिनी 
करे जयजयकार।
वरद करों को सर पर रख दो,
 दया अपरंपार।।
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 8-महागौरी 



हे शिवप्रिया कल्याण शोभना
परमपद का भार।
सब शत्रु नाशिनी पापों का
करें माँ संहार।।

तेरे पूजन से माता हम 
रहें सब नीरोग।
तुम ही देती पल में माता 
इस जगत के भोग।।

कैलाश रहती महागौरी 
वर-मुख  है गम्भीर।
इस जग के  हर प्राणी की माँ
तुम्हीं जानों पीर।।।

गौरवर्ण में रजत देह ये
विधु करे शृंगार।
हर पोर सुगंध निकलती  है 
पावन है  अपार।।


माँ गौरी की शुभ छवि से ही
श्रद्धा का संचार।।
माँ शुभ्र ओजस कर देती हैं 
सभी मलिन विचार।।
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9-सिद्धिदात्री 
  
जो मीठा फ़ल दे देती हो 
सिद्धिदात्री कहाय ।
साधक तप को करते-करते
दया इनकी पाय।।

चार भुजाओं वाली माता
शिव भी करें साध ।
अपनें बालक से ये माता
करें प्रेम अगाध ।।

शंख ,चक्र ,गदा कर में ले कर
कमल विराजमान।
ऐसी मोहक छवि का मन में
करते सभी ध्यान।।

ओज तुम्हारा बड़ा निराला
मिटा विषय -विकार।
ऐसी मोहक छवि को मनवा
पूजें बारम्बार।।

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Wednesday, September 27, 2017

761

1- मैं रचूँगा-
प्रियंका गुप्ता

मैं रचूँगा
तुम्हारे नाम पर एक कविता
उकेरूँगा अपने मन के भाव
कह दूँगा सब अनकहा
और फिर
बिना नाम की उस कविता को
कर दूँगा
तुम्हारे नाम
क्योंकि
मैं रहूँ न रहूँ
कविता हमेशा रहेगी
तुम्हारे नाम के साथ...।

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2-कुछ अलग से लोग
-प्रियंका गुप्ता

कुछ अलग से लोग
मिल जाते हैं यूँ ही
राह चलते
न तुम्हारे शहर के
न ही अपने से किसी गाँव के
फिर भी
मिलते हैं वो अक्सर
बेसबब, बेमतलब...
दूर होकर भी
चले आते हैं ख्वाबों में
ख्यालों में;
तुम्हारे माथे पर उनकी याद का बोसा
मानो
चुपके से कोई
नींद में आकर रख गया हो
दुआ का कोई फूल
तुम्हारे सिरहाने,
और जाते-जाते
कानों में कह गया हो-
खुश रहना सदा
क्योंकि
तुम मुस्कराते हुए बहुत अच्छे लगते हो
सच्ची...।
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एम.आई.जी-292, कैलाश विहार,
आवास विकास योजना संख्या-एक,
कल्याणपुर, कानपुर-208017(उ.प्र)
ईमेल: priyanka.gupta.knpr@gmail.com

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3-जिंदगी........
परमजीत कौर 'रीत'


गीत शीरीं गा रही है ज़िन्दगी
ख़ुद को यूँ बहला रही है ज़िन्दगी

क्या ,समझ में आ रही है ज़िन्दगी?
रंग बदले जा रही है ज़िन्दगी

वक़्त से बढ़कर सिकंदर  कोई अब
रू-ब-रू दिखला रही है ज़िन्दगी

जिन खिलौनों से ये खेले,उनसे ही
तालियाँ बजवा रही है ज़िन्दगी

हौंसले हैं रेज़ा-रेज़ा उड़ने को
फिर भी पर फैला रही है ज़िन्दगी

तीरगी अपना ठिकाना दे बदल 
शम्मे-दिल सुलगा रही है ज़िन्दगी

'रीत' बस मासूमियत रखना बचा
चाह धोखे, खा रही है ज़िन्दगी

4- गुज़री  है-
 परमजीत कौर 'रीत'


जीस्त यूँ इम्तिहाँ से  गुज़री  है
एक चिड़िया  तूफां से  गुज़री  है

बेख्याली में आह निकली जो
क्या बता,कहाँ से  गुज़री  है

बात को इक खबर बना देगी
ये हवा जो यहाँ से  गुज़री  है

ख्वाहिशों की पतंग याअल्लाह!
जब उड़ी कहकशां से  गुज़री  है

दो किनारों के बीच राख़ बची
बर्क यूँ दरमियाँ से  गुज़री  है

छोड़ जाती है कुछ निशां अपने
ये कज़ा ,जब जहाँ से  गुज़री  है

'रीत' परछाइयों को ले काँधे
याद हर ,दिल मकाँ से  गुज़री  है

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Thursday, September 21, 2017

760

सत्या शर्मा कीर्ति

1- पिता

मैं भी कभी पिता बन
पिता होने के उस एहसास
को पाना चाहती हूँ

कि कैसे रोक लेते हैं पिता
आँसुओं के नदी को और
फिर बन जाते हैं वे
खुद ही समंदर

कि कैसे मुस्कुराते हैं पिता
जीवन के कठिन क्षणों में भी
और खुद बन जाते हैं
राहतों के पल

कि कैसे दिल थाम  बने
रहते हैं सहज और शांत पिता
अपनी जवाँ होती बिटिया
को देखकर

कि कैसे अपने बेरोजगार बेटे
को बँधाते हैं ढाढस
और सम्भालते है उसकी
भी गृहस्थी को

कि कैसे तंगी के दिनों भी
बच्चों पर नहीं आने देते
किसी भी परेशानी के
बादल

कि कैसे कभी नहीं करते
किसी सेअपने बीमारियोंका जिक्र
और होते जाते हैं खोखले
अंदर ही अंदर

कि कैसे अपने पूरे परिवार से
दूर किसी अनजान से शहर में
गुज़ार देते है पूरी उम्र
ताकि परिवार के लिए जुटा सकें
सुविधाओं के दिन

कि कैसे अपनी बिटिया सौंप
देते हैं अजनबियों के  हाथों
पर अपने दर्द उभरने नही देते
चेहरे पर

कि कैसे छुपाते हैं अपने बुढापे को
और अपने थकते शरीर को
ढोते रहते हैं अपने ही कंधों पर

कि अपने आने बाले अंतिम
क्षणों की आहट सुनकर भी
बने रहते हैं अपनों के लिए
एक मजबूत-सी छत

हाँ एक बार पिता बन
उनके एहसास को , उनके
ज़ज़्बात को ,उनके संस्कार को ,
उनकी ऊँचाई को ,
हृदय की गहराई को छूना
चाहती हूँ

काश एक बार.....
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2- जाड़े की धूप 

ओ धूप जाड़े की
सुनो न जब कुहासे से भरे /अधखिले-से
सुबह तुम अपनी छोटी सी पोटली में बाँध
कुछ ठंडी गुनगुनी -सी धूप रख जाती हो
मेरी खिड़की की सलाखों पर /
पर वो नन्ही-सी जान वहीं पड़ी
काँपती-सी रहती है
और मैं दौड़ आँगन चली आती हूँ
जहाँ तुम आराम से सुस्ताती रहती हो.....

पर देखो न ओस की बूँदों से नहाया ये आँगन
गीला ही रहता है और / मैं 
ठंड से काँपती वहीँ अपनी फटी सी चादर में छुप  जाती हूँ

टाँग देती हूँ फिर चादर तुम्हारे आँचल में ताकि तुम
समा जाओ उसमें अपनी
गर्माहट के साथ और
मैं सो सकूँ  बिना कँपकपाए एक लम्बी-सी सर्द रात .....

ओ जाड़े की धूप कहो न मुझसे
 क्यों हो जाती हो तुम बीमार इन दिनों
जब होती है सबसे  ज्यादा जरूरत मुझे...

हाँ तो सुनो......इस बार गर्मियों में तुम
रख लेना सहेजकर कुछ अपने गर्म और सुखद धूप  .....

ताकि अगली ठंड में अपनी फटी चादर
गीले से आँगन, अपने सीलन भरे कमरे में
कुछ गर्माहट डाल  सकूँ .....

और सो सकूँ एक पूरी लम्बी सर्द रात
बगैर कँपकपाहट के

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3- द्वंद्व

मैं स्वतंत्रता और परतंत्रता के
बीच झूलती
असहाय, किंकर्तव्यविमूढ़-सी
खड़ी हूँ सदियों से
मात्र बन कर एक प्रतीक...

हमेशा की तरह बना दिया
तुमने मुझे देवी और
बाँध दी मेरी आँखों पर पट्टियाँ...

ताकि देख न सकूँ
होते निर्दोषों पर अत्याचार /
देते झूठी गवाहियाँ /
रिश्ते को होते हुए शर्मसार /
बिकते हुए ईमान /
खाते झूठी कसमें...

पर चीखती है मेरी आत्मा
झूठ के ढेर पर
हारते सत्य को देखकर
अच्छाई की लाश पर
जश्न मनाते बुराई को देख कर

रोती हूँ अपने गरीब और
असहाय बच्चों की मजबूरी पर
मेरी आँखों से भी बह निकलते हैं
रक्त के आँसू
पर हो जाते हैं जब्त
उन्ही काली पट्टियों में.....

और मैं तौलती रह जाती हूँ
अपनी ममता और तुम्हारे छल
अपने हाथों की तराजू में....

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