पथ के साथी

Sunday, October 4, 2015

नेह -नदी का नीर



अनिता मण्डा
  
               

 नेह -नदी का नीर हूँ, कर लो तुम स्वीकार
 सूना-सूना सा लगे, नेह बिना संसार।।

 कलरव करते खग उड़ें, देते पुष्प सुवास।
  धन्य भाग प्रभु ने हमें, दिया धरा पर वास।।


 जाते सूरज से मिली,  हुई जोगिया  शाम।
  घड़ी भर में सजा दिए, तारे- चाँद  तमाम।।

                सहमा-सहमा दिन गया, चुप सी आई रात।
                दिल की दिल में सब रखें, करें न कोई बात।।
               
             

  झर -झर झरती चाँदनी, भीगा हरसिंगार। 
 रजनी भीगी नेह से, पा प्रीतम का प्यार।।
               
भोर सुहानी आ गई, डूबे तारक दीप।
 कलरव कर पंछी उड़े पहुँचे गगन- समीप।।

               
 कटे न आरी -धार से, दुख तरुवर की डाल।
  समय बड़ा बलवान है, लिख देगा सुख भाल।।

                साँसें लेना कठिन है, दूषित नीर-समीर।
                पेड़ काट क्यों दे रहे ,धरती माँ को पीर।।
               
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Friday, October 2, 2015

मिलते नहीं किनारे



डॉ०पूर्णिमा राय ,अमृतसर

गीतिका

देश-प्रेम का जज्बा जिनमें उनके वारे न्यारे हैं।।
धरती पर ज्यों सिजदे करते ,आसमान के तारे हैं।

आलस जिनकी रग-रग बहता ,वह जन सुख ना पायेगा
श्रम से कोसों दूर जो रहते ,वो किस्मत से हारे हैं।।

मोती माणिक की इच्छा में  सपनों में भी खोए हैं
उलझी नैया जन्म-मरण में मिलते नहीं किनारे हैं।।

देश-एकता खातिर आओ मिलकर सब सहयोग करें
त्याग दें नीति लूटपाट की मिलते तभी सहारे हैं।।

आजादी के मतवालों ने अपना जीवन वार दिया
वीर पराक्रम की गाथाएँ युवकों तुम्हें पुकारे हैं।।

पूर्णिमा से व्योम ये चमके ओस की बूँदें सज रहीं
गूँज उठी सर्वत्र दिशाएँ इंकलाब के नारे हैं।।
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Monday, September 28, 2015

मन की मुँडेर


रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

मन की मुँडेर पर  बैठ गया

जो पंछी चुपके से आकर

बैठे रहने दो बस यूँ ही

पछताओगे उसे उड़ाकर।

यह वह पंछी नहीं बाग़ का

डाल डाल जो गीत  सुनाए,

यह वह पंछी नहीं द्वार का

दुत्कारो वापस आ जाए।

दर्पण में जब रूप निहारो

छाया आँखों में उतरेगी

बाँधो काजल -रेख सजाकर ।

बीते पल हैं रेत नदी का

बन्द मुट्ठी से बिखर गए गए हैं

किए आचमन खारे आँसू

सुधियों के रंग निखर गए हैं ।

सात जनम की पूँजी हमको

बिना तुम्हारे धूल पाँव की

बात सही यह आखर आखर।

जो भी पाती मिली तुम्हारी

छाती से हम रहे लगाए,

शायद जो हो मन की धड़कन

इस मन में भी आज समाए ।

छुए पोर से हमने सारे

गीले वे सन्देश तुम्हारे
जो हमको भी रहे रुलाकर।

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  रचनाकाल:01-07 -94
अमृत सन्देश (रायपुर)19 95 ;
प्रसारण:आकाशवाणी अम्बिकापुर 15-12-  97

Friday, September 25, 2015

रही है प्रेम की सूरत



डॉ०पूर्णिमा राय ,अमृतसर
 1  
दिलों में प्रणय की कहानी न होती
धरा पर जीवन की रवानी न होती
सुनो गान झरने का मधुरिम सुरीला
बिना जल ये कुदरत सुहानी न होती।
2
पिता के प्यार से बढ़कर नही दौलत जमाने में
सहे विपदा के ये बादल है जीवन को सजाने में
घटा छाये कभी सावन पिता छोड़े नहीं उँगली ,
बना नैया का है माँझी ये सागर पार जाने में।।
3
नहीं ठहरा निगाहों में सदा आँसू ये बहते है
मिले नफरत अगर दिल को ये हरपल गम ही सहते है
बड़ा अनमोल जीवन है गँवाना मत इसे यूँ ही
निराशा में मिले आशा  ये मन संयम में रहते है।।
4
जुबाँ चुप है ये आँखें नम वही हरपल सताती है
बहाकर प्रेम की धारा वही रिश्ते निभाती है
बदल जाती हैं तस्वीरें नहीं दिल ये कभी बदलें
बसी दिल में हो तस्वीरें वही मन को लुभाती है।।
5
किसी से भी नहीं कम है अजी औरत ज़माने में
किया जीवन समर्पित है घरौंदे को बनाने में
दिखाती हुनर है अपना मनोबल के निशाने से
रही है प्रेम की सूरत सदा सीरत दिखाने में।।
-0-