पथ के साथी
Sunday, May 16, 2021
Tuesday, May 11, 2021
1105
1-भीकम सिंह
जल
बूँद- बूँद-सा
घुट
-घुटकर
चुप्पी
धर रहा है
जल
मर रहा है
।
मुरझा
गया
झील
तालों में
नदी
नालों में
बोतलों
में भर रहा है
।
ध्वस्त
हो रहा
हिम
का किला
किरचें-
किरचें उड़
हवा
में बिखर रहा है ।
जल
मर रहा है
।
-0-
2-लहर
पुलिनों
पर
गिरती
श्वेत-सी
थोड़ा
खुद को दुबकाकर ।
सागर
पर चलती
मंथर-मंथर
लौटे
तो शरमाकर
।
-0-
क्षणिकाएँ-अंजु गुप्ता
1
उगती है
सर उठाती है
फिर...
पैरों तले रौंद दी जाती है
क्या घास, क्या औरत !
2
फर्क है…
तेरे और मेरे समर्पण में !
मैं तुझको और तू मेरी देह को
समर्पित है ! !
-0-
Sunday, May 9, 2021
1104-माँ
1-माँ
डॉ. रत्ना वर्मा
हमारी माँ जो कभी
हमें तकलीफ़ में देख
दर्द दूर करने के
अनेकों उपाय करती थी
वो आज खुद दर्द में हैं
मैं कैसे दूर करूँ उनका दर्द
वो तो खुद हम सबका
दर्द समेटती आई है
कैसे पूछूं उनसे कि माँ
कैसे समेट लेती थी तुम
आँचल में हमारा दर्द
कराहती मां को देख
दर्द से भर आती हैं मेरी आँखें
अब जाकर समझ में आया
आँसूओं से भीगे उनके
आँचल का राज़
हृदय के एक कोने में
कैसे छिपा लेती थी
हम सबका दर्द
माँ ममता की खान होती है
प्यार और दुलार का
भंडार होती है
माँ और कुछ नहीं
बस माँ होती है l
-0-
( सम्पादक उदन्ती मासिक http://www.udanti.com )
-0-
1.
हँसली बोली हार से, कलयुग है
घनघोर।
माँ की साँसें गिन रहा, बँटवारे का
शोर।।
2.
आले-खूँटी-खिड़कियाँ, चक्की-घड़े-किवाड़।
माँ की साँसें जब थमीं, रोए बुक्का
फाड़।।
3.
माँ ने मुझको दे दिया, जो था उसके
पास।
त्याग-नेकियाँ-सादगी, अपनी पूँजी
ख़ास।।
4.
फिरकी -सी फिरती रही, दिन देखा न रैन।
बच्चों के सुख में मिला, माँ को हर
पल चैन।।
-0-
सासू माँ को समर्पित -
5.
गहरे हों आघात या, विपदा हो
घनघोर।
पी लेती हर पीड़ माँ, लाने को नव
भोर।।
6.
हर दिन ही माँ का सखे, सौ टके की
बात।
पहले खोले आँख माँ, फिर होता
प्रभात।।
7.
इतराया है आसमाँ, कई
सितारे जोड़।
ख़ुदा ज़मीं के वास्ते, बचे सितारे
छोड़।।
8.
निश्छल माँ के प्यार- सा, मिला न कुछ भी शील।
दुनिया लपटें आँच की, माँ है शीतल
झील।।
9.
धागे-सी जलती रही, पिघला सारा
मोम।
ख़त्म हुई; रौशन हुए, माँ से जगती-व्योम।।
-0-
3-दोनो ही अभिनय में पारंगत ! मैं और माँ
अंजू खरबंदा
कल कितने दिन बाद मिले मैं और माँ
दिल का हाल बाँटा कुछ इघर की कुछ उधर की
जब मिल बैठे मैं और माँ !
कुछ बातों में उनका मन भर आया
कुछ में आंखे छलछला आई मेरी
जब हाल बाँटने बैठे मैं और माँ !
गई थी कि खूब बातें करूँगी
जी का सब हाल उनसे कहूँगी
अपना अपना दर्द बाँटेंगे मैं और
माँ!
हम दोनों ही प्रत्यक्ष में हँस-हँसकर बोले
कितनी बातों पर हँसे दिल खोले
पर मन ही मन सब समझे मैं और माँ!
उनकी उदास आँखो ने कहा कुछ
मेरी उदास आँखो ने भी बतलाया कुछ
वास्तव में कहकर भी कुछ न बोले मैं और माँ!
बातों -बातों में कुछ उन्होंने छुपाया
मैंने भी उनको कहां सब बतलाया
एक दूसरे से कुछ कुछ छुपाते मैं और माँ!
जिस भारी मन से गई थी
भारी मन से ही वापिस
एक दूसरे को दुख न हो-दोनों ही सोचे मैं और माँ!
-0-
दिल्ली
1103-माँ
1-माँ अब कुछ कहती नहीं!
-अनिता ललित
(यह कविता मैंने तब
लिखी थी, जब माँ जीवित थीं और कई बीमारियों की तक़लीफ़ से जूझ रहीं थीं! उनकी वह
बेबसी मुझसे देखी नहीं जाती थी! उनके पास जाकर कुछ दिन रहकर, उनके साथ वक़्त
बिताकर, जो कुछ भी उनके लिए कर सकती थी, मैंने किया! सोते समय भी वह मेरा हाथ पकड़े
रहतीं थीं, किसी छोटे बच्चे की तरह –यह याद करके मेरी आँखों में आज भी आँसू आ जाते
हैं! जनवरी, सन् 2019 में वो इस दुनिया को अलविदा कह गईं! ईश्वर से प्रार्थना है,
वे जहाँ भी हों, सुक़ून से हों, सुख में हों!)
माँ अब कुछ कहती नहीं!
लगता है, वह जीती नहीं!
ख़ाली, वीराँ आँखों से
वो बस देखा करती है;
चीख़ उठे कभी –
अनायास ही –
घुटतीं हों साँसे जैसे!
या -
कचोटता हो दर्द कोई,
भीतर ही भीतर उसको -
बयाँ नहीं कर पाती जिसको!
पीड़ा अन्दर पीते-पीते,
लगता है, वो रीत गई!
थी जीवन से भरपूर कभी जो –
वो माँ! -अब कुछ कहती नहीं,
लगता है, वह जीती नहीं!
जब से होश संभाला मैंने
माँ को बस, चलते देखा है!
घर के कोने-अतरे तक को -
उसको चमकाते देखा है!
खाना-कपड़े-झाड़ू-बर्तन
उसके हाथ खिलौने थे!
सबकी चीज़ जगह पर
मिलती
माँ, पर, एक जगह न
टिकती!
वो माँ! –अब कुछ कहती
नहीं
लगता है वो जीती
नहीं!
माँ के हाथों का खाना
जिसने खाया, उसने
जाना –
वह स्वाद अनोखा,
प्यार अनूठा –
मन को करता आज भी
मीठा !
सबको करके तृप्त सदा ही
वह कुछ खाती-पीती थी!
लेकिन, कभी-कभी, थक
कर माँ -
भूखी ही सो जाती थी!
आँधी-तूफ़ाँ या बरसात
सब उससे घबराते थे!
कड़ी धूप में साया
देती -
माँ! आँचल में भर लेती
थी!
कितनी भी हो कठिन
समस्या –
माँ! सब हल कर देती
थी!
आज विवश हो उम्र के
हाथों
बीमारी, लाचारी में –
घर के सूने कमरे में,
बेतरतीब से कोने में -
निपट अकेली पड़ी हुई
माँ -
बस! रोती है, सिसकती
है!
साँसों से जैसे थक चुकी
है!
माँ अब कुछ कहती
नहीं!
लगता है, वह जीती
नहीं!
जितने मुँह में दाँत
नहीं,
उससे ज़्यादा छाले हैं
!
पेट की आग जलाती है!
जो दे दो –खा लेती
है!
खाती क्या –निगलती
है!
न खाने का स्वाद रहा,
न जीने का चाव रहा !
खाती है –तो जिंदा
है!
जिंदा है –तो खाती
है!
माँ अब कुछ कहती नहीं
!
लगता है, वह जीती
नहीं !
अब शायद –
जीने की चाहत भी
नहीं!
-0-
अनिता ललित ,1/16 विवेक खंड ,गोमतीनगर ,लखनऊ -226010
ई मेल: anita.atgrace@gmail.com
-0-
2-माँ
डॉ. सुरंगमा
यादव
माँ है तो घर हँसता
माँ से ही घर में व्यवस्था
उसका मृदु स्पर्श
पल में दुःख हरता
आँखों से बहता
ममता का सोता
माँ के बिन खाली-खाली
मन रह -रह रोता
माँ है तो हर नखरा
वरना कौन मन रखता !
माँ मंगल रोज मनाती
मुझे अपनी उमर लगाती
डर जाऊँ जब अंधियारे से
झट से गले लगाती
माँ के आँचल से मुँह पोंछना
अब भी बड़ा सुहाता
रोज -रोज की फरमाइश
माँ पूरा करने को तत्पर
माँ का मन ज्यों नवनीत नवल
पल में द्रवित हो जाता
माँ नहीं तो अब कोई भी
कहता न थक कर आयी हो
बालों में उंगली की थिरकन
अब दूर करेगा
कौन थकन!
आशीषों से अपने
जीवन में सुख-समृद्धि भरती
अपनी खुशियों से बेपरवाह
सबकी खुशियों में खोई रहती
अपना दुःख कहे नहीं
औरों का बिन कहे समझ लेती
'माँ' एक अक्षर का शब्द मात्र
जिसमें ब्रह्माण्ड समाया
उसकी ममता पाने को
खुद ईश जगत में आया
माँ जीवन की किलकारी
आँसू पर मुस्कान सजाती
जो माँ का मान नहीं करते
वे समझो बड़े अभागे
माँ की सेवा से विरत रहें
अपनी दुनिया में खोये हैं
कल क्या हो किसने जाना
आज दुआओं से उसकी
निज दामन भर लो!
-0-
3-नींद की मीठी झपकी माँ
डॉ.महिमा श्रीवास्तव
पहाड़ों
से निकलते
फेनिल, खुशी के झरने
जैसी
थी मेरी माँ ।
टैगोर
की गीतांजलि-सी
काव्य
की सौगात
ही
थी मेरी माँ ।
जलतरंग
-सी बजती
चूड़ियों
से भरी गोरी कलाई
माखन
मिश्री- सी थी माँ ।
मेरी
बाट निहारने वाली
चंपा
-चमेली की
बगिया
जैसी थी मेरी माँ ।
झिरमिर
बारिश से
नम
हुई माटी की
सौंधी
खुशबू जैसी
मेरी
सखी थी माँ ।
मधुमालती
की बेल- सी
मेरे
मन के द्वार को
घेरे
रहती थी माँ ।
जाड़े
में नर्म रजाई- सी
मुझे
अपने में समेट लेती
ममता
की बाहों सी माँ ।
गोभी
गाजर के अचार के
मसालों
से सने हाथों वाली
स्वादों
का संसार थी माँ ।
सपने
में दिखने वाली
जादुई
छड़ी लिये
सोनपरी
जैसी थी माँ ।
पुस्तकों
पर थका
सिर
रखे हुए
मीठी
नींद की झपकीजैसी ही थी माँ।
-0- Email: jlnmc2017@gmail.com
8118805670
-0-
Thursday, May 6, 2021
Wednesday, May 5, 2021
1101-डॉ. वर्षा सिंह का जाना
डॉ. वर्षा सिंह को शत-शत नमन!!
गिरीश पंकज
सागर की रहने वाली वर्षा सिंह से मेरी कभी भेंट नहीं हुई । वे मेरी फेसबुक फ्रेंड भी नहीं थीं,
लेकिन उनकी रचनाओं से मैं लंबे समय से परिचित रहा हूं। मेरा सौभाग्य है कि लगभग तीन वर्ष पूर्व वर्षा जी ने अपने ब्लॉग 'ग़ज़लयात्रा' में 16 अक्टूबर, 2018 को मेरी ग़ज़लों पर कुछ टिप्पणी की थी। उसे मैंने फिर खोजा। उसका एक अंश विनम्रतापूर्वक यहाँ देना चाहता हूँ, ''गिरीश पंकज ऐसे रचनाकार हैं, जो अनेक सामाजिक विषयों पर अनेक विधाओं में लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं। उनका लेखन समाजोपयोगी है। जिस तरह पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया से जीवन को जारी रखने के लिए पोषक तत्त्वों का निर्माण होता है ,वैसे ही संवेदनाओं को जीवित रखने के लिए गिरीश पंकज की ग़ज़लों में निहित उत्प्रेरक तत्त्व प्रेरणा स्रोत का काम करते हैं। उनकी यह ग़ज़ल देखें, जिसमें सूर्य के प्रकाश सी ऊर्जा है।..गिरीश पंकज शायरी के नए प्रतिमान गढ़ने में सिद्धहस्त हैं।'' वर्षा सिंह की यह टिप्पणी मेरे जीवन की अनमोल धरोहर बन गई है। मैंने वर्षा जी का नंबर खोजकर उनसे बात की और धन्यवाद ज्ञापन किया। वर्षा की बहन डॉ शरद सिंह से मेरा परिचय रहा है । अनेक मौकों पर शरद सिंह से मेरी मुलाकात भी हुई, लेकिन वर्षा जी से कभी भेंट नहीं हुई । बावजूद इसके, उन्होंने मेरी ग़ज़लों पर लिखा। यह लिखना ही उनकी उदारता का, विशालता का परिचायक है । वर्षा सिंह का पूरा लेखन लोकमंगल, लोक कल्याण का लेखन रहा है। उनका जाना हिंदी साहित्य की एक बड़ी क्षति है। उनको नमन करते हुए मैं उनकी एक ग़ज़ल जो उन्होंने विश्व शांति दिवस के अवसर पर फेसबुक में पोस्ट की थी, तथा उनके ब्लॉग से एक गीत एक गीत यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ । आप भी उनके फ़ेसबुक/ ब्लॉग को देख कर उनके लेखन से परिचित हो सकते हैं।
1-शुभकामना
डॉ. वर्षा सिंह
दे रहा मन
हो विह्वल, शुभकामना।
नित खिले सुख का कमल, शुभकामना।
आज के सपने सभी साकार हों
और बिखरे हास कल, शुभकामना।
मुक्त कोरोना से हो
संसार ये
हर कदम पर हों सफल, शुभकामना।
ज्योत्स्ना बिखरे सदा सुख -शांति की
है यही निर्मल- धवल, शुभकामना।
नित्य ‘वर्षा’ हो सरस आह्लाद की
पल्लवित हो नित नवल, शुभकामना !
-0-
2-(विश्व कविता दिवस पर प्रस्तुत एक गीत)
-डॉ. वर्षा सिंह
आज चलो गाएँ ज़रा, धरती के गीत।।
धरती के गीत, धरती के
गीत।।
गीत प्रतिबंधों के, गीत अनुबंधों के
गीत संबंधों के, गीत रसगंधों के
आज चलो गाएं ज़रा, धरती के गीत।।
धरती के गीत,धरती के गीत
।।
अलसाई रात के, अँगड़ाती भोर के
नदिया के पानी में,उठती हिलोर के
शरमाते चंदा के, रंगराते सूरज के
अम्बर में उड़ते पंछियों के शोर के।
गीत कुछ उपवन के, गीत कुछ मधुबन के
गीत कुछ देहरी के, गीत कुछ आँगन के
आज चलो गाएँ ज़रा,धरती के गीत।।
धरती के गीत,धरती के गीत
।।
किशोरी झरबेरी के, बूढ़े बबूल के
हवाओं में झूलते बरगद के मूल के
बाँस
के, कपास के,युवा अमलतास के,
अरहर के, मेथी के, इमली के फूल के
गीत कुछ तरुवर के, गीत गुलमोहर के
गीत कुछ पतझर के, गीत कुछ अंकुर के
आज चलो गाएँ ज़रा, धरती के गीत।।
धरती के गीत,धरती के
गीत।।
लहराते सागर के, नैया के, पाल के
खेत - खलिहान के, पगडंडी, चौपाल के,
बादल के, ‘वर्षा’ के, गागर के, निर्झर के,
तृप्ति के, प्यास के, धूल के, गुलाल के,
गीत बौछार के, गीत कुछ प्यार के
गीत त्योहार के,
गीत अभिसार के
आज चलो गाएँ ज़रा, धरती के गीत ।।
धरती के गीत,धरती के गीत
।।
(https://varshasingh1.blogspot.com)







