पथ के साथी

Thursday, October 6, 2016

677

श्वेता राय

वो है सम्बोधन निरा मात्र, दिखें जहाँ सम्मान नहीं।
वो है उद्बोधन जिह्वा का, बसे जहाँ पर मान नहीं।।
हिय में यदि स्नेह तुम्हारे तो, शब्दों में स्वीकार करो।
चरणों में मत तुम शीश रखो, पर विचार से प्यार करो।
कठिन दौर वो गाँधी जी का, सब उनके थे अनुयायी।
उनकी एक बात पर होती, सब बातें धराशायी।
राह रोक वो खड़े हो गये, बोले अब बलिदान करो।
त्याग पत्र देकर सुभाष तुम, मेरे मत का मान करो।।
आन बान सम्मान बड़ा था, एक बात कब वो बोले।
जबकि उनके क्रोध के आगे, शेष नाग का फन डोले।।
छोड़ चले वो देश ये प्यारा, जगी खून में तरुणाई।
लिखने को अध्याय नया इक, क्रोध जनित थी अँगड़ाई।।
लौट यहाँ पर आऊँगा मैं, वंदन माँ! तेरा करता।
मातृभूमि का छू कर आँचल, शपथ हृदय में हूँ धरता।।
आज़ादी का खेल कहाँ बस, लाठी से खेला जा
गरम खून में रह रह कर ये, भावों का रेला आ।।
आज़ादी की आस लिये मन, दर दर पर थे वो भटके।
वर्मा से पहुँचे सिंगापुर, कहाँ कभी थे वो अटके।।
चौवालिस था वर्ष सदी का, विश्व युद्ध था गहराया।
अंग्रेजो की कुटिल चाल पर, बिजली बन जो भहराया।।
भारत छोडो के नारे से, गूँजी थी गलियाँ सारी।
करो मरो का भाव लिये सब, अंग्रेजो पर थे भारी।।
तभी बनाकर हिन्द फ़ौज को, चला हिन्द का मतवाला।
चलो चलो सब मिलकर दिल्ली,अम्बर तक गूँजा नाला।।
उसदिन उद्बोधन की महिमा, थी लोगों ने पहचानी।
जिस दिन सुभाष ने भारत में, आने की फिर से ठानी।।
चार जून चौवालीस को वो, देते हैं इक संबोधन।
वैचारिक सम्मान का लोगों, सुनो सुनो ये उद्बोधन।।
बापू! अपने चरणों में अब, नमन मेरा स्वीकार करें।
नये पंथ का मैं हूँ पंथी, झुका हुआ सिर हाथ धरें।।
राष्ट्र पिता! ये कार्य नेक है, राह हमारी अलग अलग।
पर पायेंगें आज़ादी हम, चलते चलते पग पग पग।।
भारत ने उस दिन दुनिया को, एक रूप था दिखलाया।
लाख दूर हो जड़ से पत्ता, पर देता उसको छाया।।
पुत्र, पुत्र ही रहा सदा से, मान पिता का है करता।
गरम खून भी झुक के हरदम, शीश चरण उनके धरता।।
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Saturday, October 1, 2016

676



आस्था झा

खौलती है जब रूह
आस्था झा
अपनी परछाई पाने को
कितना छटपटाती होगी
तमाम बारीकियाँ समेटे
खुश्क कर जाती है
जो नम थी कभी
वो ओस की बूँदें
हरी घास पर
नंगे पैर
चले तो होगे ना?
इसी नमी को
बरकरार रखने
मेरी रूह गुनगुनाती है अब
प्यार का कोई सुहाना
गीत गाती है अब
वन्दना परगिहा
कि अब जब मिट्टी में
रखोगे अपने पाँव
तो याद करना मेरा स्पर्श
मिट्टी में घुला हुआ
वो एक और
नम स्पर्श
और तुम भी
गुनगुना देना
मीठा -सा
कोई गीत
-0-Email-asthajhamaya@gmail.com

Thursday, September 29, 2016

675



1-सुनीता काम्बोज

काँटेदार झाड़ियाँ फैली, बहुत घना जग कानन है
तमस भरा है रोम- रोम में, ऐसा मन का आँगन है
ईर्ष्या के पत्ते डाली हैं,अहंकार के तरुवर हैं
काई द्वेष की जमी है इसमें, बगुलों से भरे सरोवर हैं
काँटे झूमते निंदा रूपी,घास फूस है जड़ता का
सर्प रेंगते बिच्छू खेलें , बंजर सारे गिरवर हैं
जहरीली बेले फैली हैं, न तुलसी न चंदन है
तमस--
लिप्सा के हैं मोर नाचते, तृष्णा के खग बोल रहे
करुणा, प्रेम दया, ममता भी , सहमे- सहमे डोल रहे
मुक्त करूँ कैसे मैं इनको, नवयुग का निर्माण करूँ
छल की हाला को घन काले ,सच्चाई में घोल रहे
मद के पतझड़ की छाया है ,हीं वसन्त ,न सावन है
तमस----
जल जाएँगे इक पल में ही, सच की आग लगा देना
फूल खिलाकर करुणा के तुम, गुलशन यह महका देना
पुष्प प्रेम के मुरझाए हैं ,फिर से उन्हें खिलाकर तुम
नेह-नीर से इन्हें सींचकर, उजियारा फैला देना
क्यों बिन कारण ये उलझन है ,क्यों संशय की अनबन है
तमस----
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2-परमजीत कौर 'रीत

रोज उम्मीदों की चादर -सी बिछाती है निशा
सबको सपनों के लिये जीना सिखाती है निशा
चाँद आए ,या न आए, है ये उसकी मरजी
र्घ्य देने का धरम अपना , निभाती है निशा
घोर अँधियारे से तन्हा जूझकर भी ,हर सुबह
सोने जैसा नित नया सूरज , उगाती है निशा
रोज मरकर, रोज जीना किसको कहते हैं ,ये
हर प्रभाती को गले मिल मिल बताती है निशा
छोटी छोटी खुशियों से, जीवन सजा लेना 'रीत'
छोटे -छोटे तारों से ज्यों नभ सजाती है' निशा
-0-श्री गंगानगर(राजस्थान)


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