पथ के साथी

Saturday, August 13, 2016

653



सच्चा जश्न (गीत) मात्रा-भार 16-14
डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर।
आज़ादी का दिवस सुहाना नई उमंगे लाया है।
भारत की माटी के रँग में जग को रंगने आया है।।

गीत तराने गूँज रहें हर गली-गली चौबारे में
आज़ादी का भाषण देते नेता हर गलियारे में
रंग तिरंगा खिलता तन पर मन में जोश समाया है।।

नवयुग में नई सोच से भारत आगे कदम बढ़ायेगा
गौरवशाली देश तिरंगा दुनिया में लहरागा
प्रेम-समर्पण दया-धर्म भारत का सबको भाया है।।

छोड़ गये जो यादें अपनी उन वीरों को नमन करें
वीरों के परिवारों के हम मिलकर रिसते जख्म भरें
खुशियाँ देकर कहे
पूर्णिमा सच्चा जश्न मनाया है।।
-0-

Sunday, August 7, 2016

652




1-कुछ देर तो
डॉ योगेंद्र नाथ शर्मा अरुण

कुछ देर  तो  बातें करें हम, आइए!
दिल का खालीपन भरें हम, आइए!!

ये है अँधेरा बढ़ रहा चारों  तरफ ही,
अब रोशनी बनकर झरें हम,आइए!!

मौत आनी लाज़मी है,जानते हैं हम,
क्यूं  मौत से पहले  मरे हम, आइए!!

जो नहीं भाता हमें अपने लिए साथी,
क्यूं आप की खातिर करें हम,आइए!!

कोई तो है वो, जो देखता है सबको ही
बस  'अरुण' उस से  डरें हम, आइए!!
-0-
पूर्व प्राचार्य,74/3,न्यू नेहरू नगर,रुड़की-247667 





-0-

2-रामेश्वर काम्बोज  ‘हिमांशु’

बीच सफ़र में कुछ छूटेंगे, कुछ तोड़ेंगे  सपने
थोड़े से होंगे बेगाने  , अनगिन होंगे  अपने
इन अपनों से ,बेगानों से , कब तक डरकर जीना
बहुत दिनों तक नहीं चलेगा, छुपकर आँसू पीना
-0-

Friday, August 5, 2016

651




डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर

तारों की बारात नभ ,चंदा लेके आ गया।
जादू तेरे प्यार का, मन पे मेरे छा गया।।
मोर ,पपीहा खुश हुआ, कली खिली जब बाग में;
सुरभित मन्द हवा चली,भँवरा भी मँडरा गया।।
उमड़ी काली जब घटा, डाली-डाली झूमती ;
पानी बरसा ज़ोर से, मन-आँगन महका गया।।
घूँघट ओढ़े लाज का,करती हार शृंगार है;
रूप सिमटता देख के,दर्पण भी शरमा गया।।
चलती नाव खुमार में, हर्षित हरेक बाल है;
उन्नत भारत देश में,सावन खुशियाँ ला गया।।
परिवारों में सुख बढ़े, प्रेम-भाव सौगात दें;
दूर रहें तकरार से,सावन यह समझा गया।।
सावन के त्योहार में ,माँगें सबकी ख़ैर हम;
बोल पूर्णिमाबोलती,सावन सबको भा गया।।
-0-

Sunday, July 24, 2016

650



1-सूना आशियाना
        -अनिता ललित 
 किस क़दर सूना हो जाता होगा 
उस चिड़िया का आशियाना …  
उड़ जाते होंगे जब 
उसके नन्हें-नन्हें बच्चे ,
अपने छोटे-छोटे पंख पसारकर ,
किसी नई दुनिया की ओर
अपनी नई पहचान बनाने।
शायद तभी
बुनती है वह, एक बार फिर,
एक नया नीड़ !
और नहीं लौटती
उस घर में अपने … 
कि गूँजती रहती हैं उसमें
यादों की मासूम किलकारियाँ
रीता हो जाने के बाद और भी ज़्यादा
बेपनाह, बेहिसाब … 
दिल को चीरती हुई।

और चलता रहता है ...
यही क्रम सिलसिलेवार। 
बनना, बिगड़ना, टूटना, फिर बनना
कि थकती नहीं वह !
टूटती नहीं वह !
सहते-सहते यह दर्द !
काश! सीख पाते हम इंसाँ भी !
इस दर्द के इक क़तरे को भी,  
दिल में उतारने का हुनर । 
सहते-सहते पीने,... 
पीते-पीते गुनगुनाने का फ़न !  
-0-
 2-हार मानो न तुम
          -डा.मधु त्रिवेदी
गूढ़ रहस्य हमें यह पढ़ाने लगी
बात कोई पते की बताने लगी

गलतियों से सभी लोग लो सीख अब
हर कदम पर हमें यह सिखाने लगी

आसमाँ में पंखों को लगा कर उड़े
रोज सपने नये ही दिखाने लगी

प्यार का पाठ सबको पढ़ा रोज ही
हर सुबह शाम हमकों रिझाने लगी

हार मानो न तुम आज समझा रही
वो बना आज बच्चा हँसाने लगी
-0-