पथ के साथी
Wednesday, December 3, 2008
Tuesday, December 2, 2008
रूबाइयाँ
:रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
जलने वाले खूब जलें हम हँसते हैं हम गाएँगे ॥
दुनिया बस्ती बनी ठगों की हम किसको अपना कह दें।
जिसका मन होगा सच्चा हम उसको गले लगाएँगे ॥26
जब से टूक-टूक हो बिखर गया हूँ ।
तब से और भी अधिक निखर गया हूँ।
मेरा ये पश्त मुक़द्दर रहा साथ मेरे
उम्मीदें लेकर मैं जिधर गया हूँ॥27
बचाके दामन तेरी गली से गुज़र गया हूँ ।
यादों का साया रहा साथ मैं जिधर गया हूँ ॥
देना था सिला क्या चाँद यही मेरी वफ़ा का ।
तेरे दिल से अब न्शे की तरह उतर गया हूँ ॥28
इस दिल पे तेरे क़दमों के निशान बाक़ी हैं।
महकते हुए ग़ेसुओं की पहचान बाक़ी है॥
हमेंचले गए छोड़कर तुम तो सरे-राह ।
फिर भी तुझे पा लेने के अरमान बाक़ी हैं ॥
रहती हैं हर वक़्त नशे में चूर आँखें।
कलेजे तक उतर जाती ये बेक़सूर आँखें ॥
खैर माँगो ख़ुदा से अपनी ज़िन्दगी की ।
हसीन क़यामत हैं ये पुरनूर आँखें ॥30
डूबते हुए को किनारा ही बहुत है ।
अँधेरी रात में तारा ही बहुत है ॥
एक क्या हज़ार जानें लुटा दें तुझपे हम
कजरारी आँखों का इशारा ही बहुत है ॥
31
इन स्याह ग़ेसुओं में पनाह दे दो।
दिल तक पहुँचने की राह दे दो ॥
ताउम्र रहे दिल में तेरी हसरत ।
नादान दिल को वह ग़ुनाह दे दो॥32
लिख-लिखकर मेरा नाम मिटाने वाले ।
तन्हाई में छुपकर आँसू बहाने वाले ॥
मेरी रुह की बेकली भला तू क्या जाने ।
यादों के निशान नहीं कभी जाने वाले ॥
Sunday, November 16, 2008
राष्ट्रीय पुस्तक सप्ताह का आयोजन
राष्ट्रीय पुस्तक सप्ताह का आयोजन
Tuesday, November 11, 2008
रूबाइयाँ-
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
17
हाथ सब्रो-क़रार का छूटा तेरी गली में ।
पैमाना छलकते प्यार का फूटा तेरी गली मे॥
जब मिले आज तुम मुझे अजनबी की तरह ।
टूटा हुआ साज़ और टूटा तेरी गली में ॥
18
बेमुरव्वत पर हम अपनी जाँ निसार क्या करें ।
चन्द लम्हात को भला झूठा प्यार क्या करें ॥
झुककर जिसकी फिर उठ नहीं पाई नज़र ।
पत्थर के उस बुत का दीदार क्या करें ॥
19
ज़िन्दगी के सब अहसास मिटा दिए मैंने ।
अपने मज़ार के चिराग़ खुद बुझा दिए मैंने ॥
मौत से छूटे तो हमें ज़िन्दगी ले डूबी ।
बुते काफ़िर पर सभी सज़दे लुटा दिए मैंने ॥
20
अफ़साना आँसुओं का सुनता रहा ज़माना ।
अफ़सोस कि तुम भी बेरहम हो गए हो ।
मुझको नहीं गवारा तेरा नज़रेंचुराना॥
21
चार घड़ी की ज़िन्दगी में जुल्मो-सितम ढाता है तू॥
बन सका न गर तू किसी के दर्द की मीठी दवा ।
जन्म देने वाली माँ की गोद क्यों लजाता है तू ॥
22
सिर्फ़ ईश्वर का नाम ही दु:ख-दर्द भागा देता है।
पशु को करें प्यार तो बाजी जान की लगा देता है ॥
कितना ही करो उपकार चाहे प्राण भी दे दो ।
पर हाय रे पापी इंसान तू फिर भी दगा देता है ॥
23
रोने में क्या धरा और क्या फ़रियाद करने में ।
क्या मिलेगा चाँद तुझे किसी को याद करने में ॥
अपने हाथों आशियाँ को तू लगादे आग ।
तड़पना ही मिलेगा तुझे दिल को आबाद करने में ॥
24
गहन अँधियारे में भी दीपक सदा अकेले जलता ।
नीरव नीले महाकाश में सूरज इकला चलता॥
सोता है संसार रात में चाँद जागता इकला ।
शैल-शृंग पर हिमखण्ड भी चुपके-चुपके गलता ॥
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