भाषा एक संस्कार
- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
एक पुरानी कथा है । एक राजा शिकार खेलने के लिए वन में गया । शेर का पीछा करते करते बहुत दूर निकल गया। सेनापति और सैनिक सब इधर उधर छूट गए। राजा रास्ता भटक गया। सैनिक और सेनापति भी राजा को खोजने लगे।सभी परेशान थे। एक अंधा भिखारी चौराहे पर बैठा था। कुछ सैनिक उसके पास पहुँचे। एक सैनिक बोला 'क्यों बे अंधे ! इधर से होकर राज गया है क्या?'
'नहीं भाई !' भिखारी बोला। सैनिक तेजी से आगे बढ गए।
कुछ समय बाद सेनापति भटकते हुआ उसी चौराहे पर पहुँचा।उसने अंधे भिखारी से पूछा 'क्यों भाई अंधे ! इधर से राज गए हैं क्या?'
'नहीं जी, इधर से होकर राजा नहीं गए हैं ।'
सेनापति राजा को ढूँढने के लिए दूसरी दिशा में बढ़ ग़या।
इसी बीच भटकते-भटकते राजा भी उसी चौराहे पर जा पहुँचा। उसने अंधे भिखारी से पूछा - 'क्यों भाई सूरदास जी ! इस चौराहे से होकर कोई गया है क्या?'
'हाँ महाराज ! इस रास्ते से होकर कुछ सैनिक और सेनापति गए हैं।'
राजा चौंका - 'आपने कैसे जाना कि मैं राजा हूँ और यहाँ से होकर जाने वाले सैनिक और सेनापति थे ?'
'महाराज ! जिन्होंने 'क्यों बे अंधे' कहा वे सैनिक हो सकते हैं। जिसने 'क्यों भाई अंधे' कहा वह सेनापति होगा। आपने 'क्यों भाई सूरदास जी !'कहा.आप राजा हो सकते हैं।आदमी की पहचान उसकी भाषा से होती है और भाषा संस्कार से बनती है। जिसके जैसे संस्कार होंगे, वैसी ही उसकी भाषा होगी ।
जब कोई आदमी भाषा बोलता है तो साथ में उसके संस्कार भी बोलते हैं। यही कारण है कि भाषा शिक्षक का दायित्व बहुत गुरुतर और चुनौतीपूर्ण है। परम्परागत रूप में शिक्षक की भूमिका इन तीन कौशलों - बोलना, पढ़ना और लिखना तक सीमित कर दी गई है। केवल यांत्रिक कौशल किसी जीती जागती भाषा का उदाहरण नहीं हो सकते हैं। सोचना और महसूस करना दो ऐसे कारक हैं जिनसे भाषा सही आकार पाती है। इनके बिना भाषा गूँगी एवं बहरी है, इनके बिना भाषा संस्कार नहीं बन सकती, इनके बिना भाषा युगों-युगों का लम्बा सफर नहीं तय कर सकती; इनके बिना कोई भाषा किसी देश या समाज की धड़कन नहीं बन सकती। केवल सम्प्रेषण ही भाषा नहीं है। दर्द और मुस्कान के बिना कोई भाषा जीवन्त नहीं हो सकती। सोचना भी केवल सोचने तक सीमित नहीं । सोचने में कल्पना का रंग न हो तो क्या सोचना। कल्पना में भाव का रस न हो तो किसी भी भाषा का भाषा होना बेकार। भाव ,कल्पना और चिन्तन भाषा को उसकी आत्मा प्रदान करते हैं।
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भाषा-शिक्षक खुद ही पूरे समय बोलता रहे,यह शिक्षण की सबसे बडी क़मजोरी है। प्रायः यह देखने में आता है कि बहुत से बच्चों को वर्ष में एक बार भी भाषा की कक्षा में बोलने का अवसर नहीं मिल पाता है। बिना बोले भाषा का परिष्कार एवं संस्कार कैसे हो सकता है? बच्चों के आसपास का संसार बहुत बड़ा एवं व्यापक है। दिन भर बहुत कुछ बोलने वाले वाले बच्चों को कक्षा में मौन धारण करके बैठना पड़ता है। यह किसी यातना से कम नहीं। बच्चों के भी अपने कच्चे-पक्के विचार हैं । उन्हें अभिव्यक्त करने का अवसर मिलना चाहिए। अभिव्यक्ति का यह अवसर ही भाषा को माँजता और सँवारता है। 'खामोश पढ़ाई जारी है' की स्थिति भाषा के लिए शुभ संकेत नहीं है। हमें इस प्रवृत्ति में बदलाव लाना पडेग़ा। दुनिया के अधिकतर झगड़े भाषा के गलत प्रयोग,गलत हाव-भाव के कारण पैदा होते हैं। बिगड़े सम्बन्ध भाषा के सही प्रयोग से सुलझ भी जाते हैं। बहुत से 90 प्रतिशत अंक पाने वाले बच्चे भी कमजोर अभिव्यक्ति के चलते अपनी बात सही ढंग से नहीं कह पाते। अतः आज के परिप्रेक्ष्य में यह आवश्यक है कि बच्चें को बोलने का भरपूर मौका दिया जाए ; तभी अभिव्यक्तिकौशल में निखार आएगा।
छोटी कक्षाओं से ही इस दिशा में बल दिया जाना चाहिए। संवाद, समूह-गान एकालाप, कविता पाठ, कहानी कथन, दिनचर्या-वर्णन के द्वारा बच्चों की झिझक दूर की जा सकती है।
पाठ्य-पुस्तकें केवल दिशा निर्देश के लिए होती हैं .उन्हें समग्र नही मान लेना चाहिए। अतिरिक्त अध्ययन के द्वारा भाषा की शक्ति बढाई जा सकती। बच्चों को निरन्तर नया पढ़ने के लिए प्रेरित करना जरूरी है। यह तभी संभव है, जब शिक्षक भी निरन्तर नया पढ़ने की ललक लिए हुए हों।
भाषा के शुद्ध रूप का बच्चों को ज्ञान होना चाहिए। इसके लिए निरन्तर अभ्यास जरूरी है। अशुद्ध शब्दों का अभ्यास नहीं कराना चाहिए। कुछ शिक्षक अशुद्ध शब्दों को लिखवाकर फिर उनका शुद्ध रूप लिखवाकर अभ्यास कराते हैं। ऐसा करना उचित नहीं है। बच्चों को दोनों प्रकार के शब्दों का बराबर अभ्यास हो जाएगा। वे सही और गलत दोनों का समान अभ्यास करने के कारण शुद्ध प्रयोग करने में सक्षम नहीं हो पाएँगे। संशोधित किये गए सही शब्दों की सूची अलग से बनवानी चाहिए.इससे यह पता चल सकेगा कि कौन छात्र किन -किन शब्दों की वर्तनी गलत लिखता रहा है। निर्धारित अन्तराल के बाद वर्तनी की अशुद्धियों में क्या कमी आई है। श्रुतलेख के माध्यम से अशुद्धियों में आई कमी का आकलन किया जा सकता है।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि सभी कौशलों का निरन्तर अभ्यास भाषा को प्रभावशाली बनाने की भूमिका निभा सकता है।
o रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
प्राचार्य, केन्द्रीय विद्यालय
आयुध उपस्कर निर्माणी, हजरतपुर
जि0 फिरोजाबाद ( उ0प्र0)283103
WWW http://www.srijangatha.com
पथ के साथी
Friday, June 15, 2007
नहीं मिला
ज्ञानेन्द्र ‘साज़’
ढूँढा किए जिसे वो उमर भर नहीं मिला
चलता रहा मगर तो सफर पर नहीं मिला ।
जब से उधार ले गया वह हमसे माँगकर
चक्कर पे चक्कर काटे पर घर पर नहीं मिला ।
छत पर किसी से बात में मशगूल था इतना
कितना पुकारा नीचे उतर कर नहीं मिला ।
वह मिलना चाहता था अपने समाज से
दहशतज़दा था इस कदर डरकर नहीं मिला ।
महफ़िल में उसकी हम गए फिर भी वो ऐंठ में
बैठा ही रहा हमसे वो उठकर नहीं मिला ।
कैसा अजीब दौर है ऐ दोस्त क्या कहूँ
दिल भी मिलाया था मगर दिलबर नहीं मिला ।
होली हो, ईद हो मगर ये देखिए कमाल
जो भी मिला गले से , वह खुलकर नहीं मिला ।
हुआ जवान तो हिस्से की बात को लेकर
बचपन के जैसा ,भाई भी हँसकर नहीं मिला।
मन्दिर में,मस्ज़िदों में,गिरजों में कहीं भी
ढूँढा तो बहुत था कहीं ईश्वर नहीं मिला ।
कुण्ठित है मगर जी रहे हैं फिर भी शान से
हमको किसी के धड़ के ऊपर सर नहीं मिला ।
रहज़न मिले,लुटेरे मिलें नक़बज़न मिले
ऐ साज़ मेरे देश को रहबर नहीं मिला ।
ढूँढा किए जिसे वो उमर भर नहीं मिला
चलता रहा मगर तो सफर पर नहीं मिला ।
जब से उधार ले गया वह हमसे माँगकर
चक्कर पे चक्कर काटे पर घर पर नहीं मिला ।
छत पर किसी से बात में मशगूल था इतना
कितना पुकारा नीचे उतर कर नहीं मिला ।
वह मिलना चाहता था अपने समाज से
दहशतज़दा था इस कदर डरकर नहीं मिला ।
महफ़िल में उसकी हम गए फिर भी वो ऐंठ में
बैठा ही रहा हमसे वो उठकर नहीं मिला ।
कैसा अजीब दौर है ऐ दोस्त क्या कहूँ
दिल भी मिलाया था मगर दिलबर नहीं मिला ।
होली हो, ईद हो मगर ये देखिए कमाल
जो भी मिला गले से , वह खुलकर नहीं मिला ।
हुआ जवान तो हिस्से की बात को लेकर
बचपन के जैसा ,भाई भी हँसकर नहीं मिला।
मन्दिर में,मस्ज़िदों में,गिरजों में कहीं भी
ढूँढा तो बहुत था कहीं ईश्वर नहीं मिला ।
कुण्ठित है मगर जी रहे हैं फिर भी शान से
हमको किसी के धड़ के ऊपर सर नहीं मिला ।
रहज़न मिले,लुटेरे मिलें नक़बज़न मिले
ऐ साज़ मेरे देश को रहबर नहीं मिला ।
Saturday, June 9, 2007
मरुस्थल के वासी

श्याम सुन्दर अग्रवाल
गरीबों की एक बस्ती में लोगों को संबोधित करते हुए मंत्रीजी ने कहा, “इस साल देश में भयानक सूखा पड़ा है। देशवासियों को भूख से बचाने के लिए जरूरी है कि हम सप्ताह में कम से कम एक बार उपवास रखें।”
मंत्री के सुझाव से लोगों ने तालियों से स्वागत किया।
“हम सब तो हफते में दो दिन भी भूखे रहने के लिए तैयार हैं। भीड़ में सबसे आगे खड़े व्यक्ति ने कहा।
मंत्रीजी उसकी बात सुनकर बहुत प्रभावित हुए और बोले, “जिस देश में आप जैसे भक्त लोग हों, वह देश कभी भी भूखा नहीं मर सकता।
मंत्रीजी चलने लगे जैसे बस्ती के लोगों के चेहरे प्रश्नचिह्न बन गए हों।
उन्होंने बड़ी उत्सुकता के साथ कहा, ‘अगर आपको कोई शंका हो तो दूर कर लो।’
थोड़ी झिझक के बाद एक बुजुर्ग बोला, ‘साब! हमें बाकी पाँच दिन का राशन कहाँ से मिलेगा ?’
*******
रिश्ता

डा श्याम सुन्दर 'दीप्ति'
बस में बैठे निहालसिंह ने अपना गाँव नजदीक आते देख, सीट छोड़ी और ड्राइवर के पास जाकर धीमे से बोला, "डरैवर साब जी, जरा नहर के पुल पर थोड़ा-सा ब्रेक पर पाँव रखना।"
"क्या बात है? कंडक्टर की बात नहीं सुनी थी?" ड्राइवर ने खीझकर कहा।
"अरे भई, जरा जल्दी थी। भाई बनकर ही सही। देख तू भी जट और मैं भी जट। बस जरा-सा रोक देना।" निहालसिंह ने गुजारिश की।
ड्राइवर ने निहालसिंह को देखा और फिर उसने भी धीमे से कहा, "मैं कोई जट-जुट नहीं, मैं तो मजबी हूँ।"
निहाले ने जरा रुककर कहा,"तो क्या हुआ? सिख भाई हैं हम, वीर [भाई] बनकर रोक दे।"
ड्राइवर इस बार जरा-सा मुसकाया और बोला, "मैं सिक्ख भी नहीं हूँ, सच पूछे तो।"
"तुम तो यूँ ही मीन-मेख में पड़ गए हो। आदमी ही आदमी की दवा होता है। इससे बड़ा भी कुछ है।"
जब निहाले ने इतना कह तो ड्राइवर ने खूब गौर से उसको देखा और ब्रेक लगा दी।
"क्या हुआ?" कंडक्टर चिल्लाया, "मैंने पहले नहीं कहा था? किसलिए रोक दी?"
"कोई नहीं, कोई नहीं। एक नया रिश्ता निकल आया था।" ड्राइवर ने कहा और निहालसिंह तब तक नीचे उतर गया था।
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Sunday, June 3, 2007
अधर पर मुस्कान
।
अधर पर मुस्कान दिल में डर लिये
लोग ऐसे ही मिले पत्थर लिये।
आँधियाँ बरसात या कि बर्फ़ हो
सो गये फुटपाथ पर ही घर लिये।
धमकियों से क्यों डराते हो हमें
घूमते हम सर हथेली पर लिये।
मिल सका कुछ को नहीं दो बूँद जल
और कुछ प्यासे रहे सागर लिये ।
हार पहनाकर जिन्हें हम खुश हुए
वे खड़े हैं सामने पत्थर लिये ।
..............
कितनी बड़ी धरती
कितनी बड़ी धरती ,
बड़ा आकाश है !
बाँट दूँ वह सब ,
जो मेरे पास है ।
बहुत दिया जग ने
मैंने दिया कम ।
कैसे चुकाऊँ कर्ज़
इसी का है ग़म ।
अपने या पराए कौन ,
यह आभास है ।
…………
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
19मार्च 07
Wednesday, May 2, 2007
Tuesday, May 1, 2007
बहुत बोल चुके
बहुत बोल चुके
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
बहुत बोल चुके अब न बोलो
अपने मन की गाँठ न खोलो ।
गाँठ खोलकर अब तक तुमने
जितना भी था सभी गँवाया ।
मेरे यार ज़रा बतलादो
बदले में तुमने क्या पाया ?
बहुत तोल चुके अब न तोलो।
जिनको अब तक तुमने तोला
उन सबको पाया है पोला ।
वार किया उसने ही छुपकर
जिसको तुमने समझे भोला ।।
अब सबके मन अमृत न घोलो ।
अमृत घोला जिसके मन में
उसका मन विष-बेल हो गया ।
धोखा देकर खिल-खिल हँसना
उन लोगों का खेल हो गया ।।
बहुत बोल चुके अब न बोलो
अपने मन की गाँठ न खोलो ।
…………………………
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
बहुत बोल चुके अब न बोलो
अपने मन की गाँठ न खोलो ।
गाँठ खोलकर अब तक तुमने
जितना भी था सभी गँवाया ।
मेरे यार ज़रा बतलादो
बदले में तुमने क्या पाया ?
बहुत तोल चुके अब न तोलो।
जिनको अब तक तुमने तोला
उन सबको पाया है पोला ।
वार किया उसने ही छुपकर
जिसको तुमने समझे भोला ।।
अब सबके मन अमृत न घोलो ।
अमृत घोला जिसके मन में
उसका मन विष-बेल हो गया ।
धोखा देकर खिल-खिल हँसना
उन लोगों का खेल हो गया ।।
बहुत बोल चुके अब न बोलो
अपने मन की गाँठ न खोलो ।
…………………………
Monday, April 23, 2007
अन्तर्राज्यीय लघुकथा सम्मेलन
अन्तर्राज्यीय लघुकथा सम्मेलनपंजाबी साहित्य अकादमी,लुधियाना एवं त्रैमासिक पत्रिका ‘मिन्नी’ के संयुक्त तत्त्वाधान में 15 अप्रैल 2007 को पंजाबी साहित्य अकादमी के सभागार में लघुकथा सम्मेलन का शुभारम्भ हुआ । अकादमी के अध्यक्ष डा॰सुरजीत पातर ,महासचिव श्री रविन्दर भट्टल डा॰अरुण मित्रा (मुख्य अतिथि) , श्री भगीरथ (कोटा) ,श्री सूर्य कान्त नागर (इन्दौर) ,श्री सुकेश साहनी (बरेली),श्री श्याम सुन्दर अग्रवाल (कोटकपूरा), डा॰श्याम सुन्दर ‘दीप्ति’ (अमृतसर) मंच पर उपस्थित थे ।इनके अतिरिक्त देश के विभिन्न भागों से आए हिन्दी एवं पंजाबी के कथाकार -समीक्षक मौजूद थे ।इनमे थे –सर्वश्री सुभाष नीरव ,बलराम अग्रवाल (दिल्ली) सुरेश शर्मा (इन्दौर) ,अशोक भाटिया (करनाल) , डा॰सुरेन्द्र मंथन (बंगा) , डा॰अनूप सिंह(बटाला),हरभजन सिंह खेमकरणी(अमृतसर), विक्रमजीत सिंह ‘नूर’(गिद्द्ड़बाहा),सुरिन्दर कैले (ठक्करवाल), रत्नेश (चंडीगढ़) ,जसवीर चावला ,हरप्रीत राणा निरंजन बोहा,रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ आदि। इस सम्मेलन की अध्यक्षता की सुप्रसिद्ध पजाबी कवि एवं पंजाबी साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डा॰सुरजीत सिंह पातर ने । हिन्दी –पंजाबी का यह सम्मेलन श्री श्याम सुन्दर अग्रवाल एवं डा॰श्याम सुन्दर ‘दीप्ति’के प्रयासों से निरन्तर 18-19 वर्षों से आयोजित किया जा रहा है । यह सम्मेलन हिन्दी एवं पंजाबी का संयुक्त प्रयास होने के कारण दिल्ली , पंजाब ( अमृतसर ,कोटकपूरा,मोगा ,कपूरथला,बटाला) हरियाणा (सिरसा , करनाल) ,हिमाचल(डलहौजी) उत्तर प्रदेश(बरेली) आदि विभिन्न स्थानों पर आयोजित हो चुका है ।इस सम्मेलन का उद्देश्य है हिन्दी –पंजाबी भाषा के लेखकों के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों को एक- दूसरे के निकट लाना और एक साझी लेखकीय समझ और विचार –विमर्श को विकसित करना ।
डा॰सुरजीत पातर ने विश्व लघुकथा संग्रह ‘मिन्नी कहाणी दा संसार’ या । जसवीर चावला की दो हिन्दी पुस्तकों- ‘सच के सिवा’ और ‘आतंकवादी’ का विमोचन किया गया ।
डा॰कुलदीप सिंह ‘दीप’और डा॰अनूप सिंह ने पजाबी-हिन्दी लघुकथाओं का विश्लेषण करते हुए वर्तमान सामाजिक सरोकारों की ज़रूरत पर बल दिया,। डा॰दीप ने ‘मिन्नी कहाणी दे ग्लोबली सरोकार’ में खुले बाज़ार के समर्थन एवं विकास के छद्म प्रचार को रेखांकित करते हुए आने वाले ख़तरों से आगाह किया कि यह सब नियोजित ढंग से किया जा रहा है ,आने वाले समय में जिसके दुखद परिणाम होंगे । लघुकथाओं के सन्दर्भ में डा॰दीप ने अपनी बात की पुष्टि की ।इनमें सूर्यकान्त नागर (प्रदूषण) ,निरंजन बोहा (शीशा) ,धरम पाल साहिल (सोच) ,विक्रम सोनी (छित्तर की जात-जूते की जात) श्याम सुन्दर अग्रवाल (रांग नम्बर) आदि का उल्लेख किया ।
इसी क्रम में डा॰अनूप सिंह ने लघुकथा के विषय एवं रूप पक्ष पर अपनी सधी हुई भाषा में विचार व्यक्त किए । डा॰ सिंह ने विश्व की विभिन्न भाषाओं के उदाहरण देकर अपनी बात की पुष्टि की ।उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा-भाषण , दोस्तों के साथ की गई गपशप लघुकथा का विषय नहीं बन सकते हैं । चुश्त संवाद एवं व्यंग्य की विशिष्टता रचना को प्रभावशाली बनाने में सहायक होते हैं।
तत्पश्चात डा॰ अशोक भाटिया , सुभाष नीरव निरंजन बोहा ,सूर्यकान्त नागर सुकेश साहनी , बलराम अग्रवाल ने अपने विचार प्रकट किए । सुभाष नीरव ने वाह ! से आह ! तक विस्तार पाने वाले बाज़ारवाद के भयावह परिणाम से सचेत किया । लघुकथाओं में इन नवीन विषयों की प्रस्तुति पर संतोष प्रकट किया ।
श्री सुकेश साहनी ने आज विश्व लघुकथा की विमोचित पुस्तक ‘ मिन्नी कहाणी दा संसार’ पर अपने विचार प्रकट किए ।उन्होंने कहा-दीप्ति-अग्रवाल एवं नूर द्वारा सम्पादित इस पुस्तक में विश्व भर की चुनी हुई श्रेष्ठ रचनाएँ आश्वस्त करती हैं कि लघुकथाओं का भविष्य उज्ज्वल है।लघुकथाओं में पिछले तीस वर्षों से परिवर्तन देखने को मिलता है । सजग लेखक भविष्यद्रष्टा होता है ।समय की पदचाप उसकी रचनाओं मे महसूस होने लगती है ।रचना का सन्देश महत्त्वपूर्ण होता है। यदि ऐसी रचना शिल्प के स्तर पर कमज़ोर है तो उस पर मेहनत करने की ज़रूरत है ।
डा॰सूर्यकान्त नागर ने सचेत किया कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने उत्पादों के साथ अपने विचारों को भी हमारे मन-मस्तिष्क पर थोप रही हैं। रचना कला एवं रचनात्मक कल्पना के साथ हमारे सामने आए। रचना में जो कुछ अनकहा होता है , वही रचना की सबसे बड़ी ताकत है।
इस अवसर पर श्री भगीरथ को उनके लघुकथा में किए गए अवदान के लिए सम्मानित किया गया ।इसी अवसर पर पंजाबी लघुकथा प्रतियोगिता के विजेताओं को भी पुरस्कृत किया गया ।
डा॰सुरजीत पातर ने विश्व लघुकथा संग्रह ‘मिन्नी कहाणी दा संसार’ का विमोचन किया । जसवीर चावला की दो हिन्दी पुस्तकों- ‘सच के सिवा’ और ‘आतंकवादी’ का विमोचन भी इस अवसर पर किया गया ।डा॰पातर ने
अपने अध्यक्षीय भाषण में डा॰सुरजीत पातर ने कहा-‘सरल लिखना बहुत कठिन है (सोखा लिखणा बहुत ओखा) हमारे जीवन की हर छोटी-बड़ी घटना-बात का बहुत महत्त्व होता है ।हम समाज को बदल पाएँ या न बदल पाएँ ;हमें कोशिश तो ज़रूर करनी चाहिए। डा॰पातर ने जलते पेड़ की आग बुझाने का असफल प्रयास करने वाली चिड़िया का उदाहरण देकर अपने विचार को रेखांकित किया।सबके अनुरोध पर डा॰पातर ने मधुर स्वर में ‘कभी दरिया इकल्ला तै नहीं करदा दिशा अपणी’ ग़ज़ल सुनाई ,जिसके प्रभावशाली अशआर ने श्रोताओं को भाव –विभोर कर दिया।कार्यक्रम का संचालन डा॰ श्यामसुंदर ‘दीप्ति’ ने किया ।श्री श्याम सुन्दर अग्रवाल के धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ ।
डा॰सुरजीत पातर ने विश्व लघुकथा संग्रह ‘मिन्नी कहाणी दा संसार’ या । जसवीर चावला की दो हिन्दी पुस्तकों- ‘सच के सिवा’ और ‘आतंकवादी’ का विमोचन किया गया ।
डा॰कुलदीप सिंह ‘दीप’और डा॰अनूप सिंह ने पजाबी-हिन्दी लघुकथाओं का विश्लेषण करते हुए वर्तमान सामाजिक सरोकारों की ज़रूरत पर बल दिया,। डा॰दीप ने ‘मिन्नी कहाणी दे ग्लोबली सरोकार’ में खुले बाज़ार के समर्थन एवं विकास के छद्म प्रचार को रेखांकित करते हुए आने वाले ख़तरों से आगाह किया कि यह सब नियोजित ढंग से किया जा रहा है ,आने वाले समय में जिसके दुखद परिणाम होंगे । लघुकथाओं के सन्दर्भ में डा॰दीप ने अपनी बात की पुष्टि की ।इनमें सूर्यकान्त नागर (प्रदूषण) ,निरंजन बोहा (शीशा) ,धरम पाल साहिल (सोच) ,विक्रम सोनी (छित्तर की जात-जूते की जात) श्याम सुन्दर अग्रवाल (रांग नम्बर) आदि का उल्लेख किया ।
इसी क्रम में डा॰अनूप सिंह ने लघुकथा के विषय एवं रूप पक्ष पर अपनी सधी हुई भाषा में विचार व्यक्त किए । डा॰ सिंह ने विश्व की विभिन्न भाषाओं के उदाहरण देकर अपनी बात की पुष्टि की ।उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा-भाषण , दोस्तों के साथ की गई गपशप लघुकथा का विषय नहीं बन सकते हैं । चुश्त संवाद एवं व्यंग्य की विशिष्टता रचना को प्रभावशाली बनाने में सहायक होते हैं।
तत्पश्चात डा॰ अशोक भाटिया , सुभाष नीरव निरंजन बोहा ,सूर्यकान्त नागर सुकेश साहनी , बलराम अग्रवाल ने अपने विचार प्रकट किए । सुभाष नीरव ने वाह ! से आह ! तक विस्तार पाने वाले बाज़ारवाद के भयावह परिणाम से सचेत किया । लघुकथाओं में इन नवीन विषयों की प्रस्तुति पर संतोष प्रकट किया ।
श्री सुकेश साहनी ने आज विश्व लघुकथा की विमोचित पुस्तक ‘ मिन्नी कहाणी दा संसार’ पर अपने विचार प्रकट किए ।उन्होंने कहा-दीप्ति-अग्रवाल एवं नूर द्वारा सम्पादित इस पुस्तक में विश्व भर की चुनी हुई श्रेष्ठ रचनाएँ आश्वस्त करती हैं कि लघुकथाओं का भविष्य उज्ज्वल है।लघुकथाओं में पिछले तीस वर्षों से परिवर्तन देखने को मिलता है । सजग लेखक भविष्यद्रष्टा होता है ।समय की पदचाप उसकी रचनाओं मे महसूस होने लगती है ।रचना का सन्देश महत्त्वपूर्ण होता है। यदि ऐसी रचना शिल्प के स्तर पर कमज़ोर है तो उस पर मेहनत करने की ज़रूरत है ।
डा॰सूर्यकान्त नागर ने सचेत किया कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने उत्पादों के साथ अपने विचारों को भी हमारे मन-मस्तिष्क पर थोप रही हैं। रचना कला एवं रचनात्मक कल्पना के साथ हमारे सामने आए। रचना में जो कुछ अनकहा होता है , वही रचना की सबसे बड़ी ताकत है।
इस अवसर पर श्री भगीरथ को उनके लघुकथा में किए गए अवदान के लिए सम्मानित किया गया ।इसी अवसर पर पंजाबी लघुकथा प्रतियोगिता के विजेताओं को भी पुरस्कृत किया गया ।
डा॰सुरजीत पातर ने विश्व लघुकथा संग्रह ‘मिन्नी कहाणी दा संसार’ का विमोचन किया । जसवीर चावला की दो हिन्दी पुस्तकों- ‘सच के सिवा’ और ‘आतंकवादी’ का विमोचन भी इस अवसर पर किया गया ।डा॰पातर ने
अपने अध्यक्षीय भाषण में डा॰सुरजीत पातर ने कहा-‘सरल लिखना बहुत कठिन है (सोखा लिखणा बहुत ओखा) हमारे जीवन की हर छोटी-बड़ी घटना-बात का बहुत महत्त्व होता है ।हम समाज को बदल पाएँ या न बदल पाएँ ;हमें कोशिश तो ज़रूर करनी चाहिए। डा॰पातर ने जलते पेड़ की आग बुझाने का असफल प्रयास करने वाली चिड़िया का उदाहरण देकर अपने विचार को रेखांकित किया।सबके अनुरोध पर डा॰पातर ने मधुर स्वर में ‘कभी दरिया इकल्ला तै नहीं करदा दिशा अपणी’ ग़ज़ल सुनाई ,जिसके प्रभावशाली अशआर ने श्रोताओं को भाव –विभोर कर दिया।कार्यक्रम का संचालन डा॰ श्यामसुंदर ‘दीप्ति’ ने किया ।श्री श्याम सुन्दर अग्रवाल के धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ ।
प्रस्तुति:- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
प्राचार्य
केन्द्रीय विद्यालय आयुध उपस्कर निर्माणी
हज़रतपुर ज़ि0 फ़ीरोज़ाबाद (उतर प्रदेश) 283103
Tuesday, March 27, 2007
बाल-जगत
हम चाँद बनेंगे
हम चाँद बनेंगे
अँधियारे में
पथ दिखलाएँगे
हम बन कर तारे
सूने नभ में
फूल खिलाएँगे ।
हम बनकर सूरज
नया उजाला
लेकर आएँगे ।
हम बनकर भौंरे
उपवन-उपवन
गीत सुनाएँगे ।
हम फूल बनेंगे
प्यारी खुशबू
रोज लुटाएँगे ।
अब हमने ठाना
इस धरती को
स्वर्ग बनाएँगे ।
…………………………………………
सूरज का गुस्सा
सूरज को गुस्सा आता
धरती को जड़ता चाँटे ।
मन में जितनी आग भरी
सारी दुनिया को बाँटे ।
झुलसे पेड़ों के पत्ते
पौधे सारे कुम्हलाए ।
प्यासे गैया-बकरी भी
पानी-पानी चिल्लाए ।
चीख सुनी जब बादल ने
दौड़ा-दौड़ा वह आया ।
दशा देखकर धरती की
जीभर पानी बरसाया ।
……………………………………………
सबसे प्यारे
सूरज मुझको लगता प्यारा
लेकर आता है उजियारा ।
सूरज से भी लगते प्यारे
टिम-टिम करते नन्हें तारे।
तारों से भी प्यारा अम्बर
बाँटे खुशियाँ झोली भर-भर।
चन्दा अम्बर से भी प्यारा
गोरा चिट्टा और दुलारा ।
चन्दा से भी प्यारी धरती
जिस पर नदियाँ कल-कल करती ।
पेड़ों की हरियाली ओढ़े
हम सबके है मन को हरती ।
हँसी दूध –सी जोश नदी –सा
भोले मुखड़े मन के सच्चे ।
धरती से प्यारे भी लगते
खिल-खिल करते नन्हें बच्चे ।
इन बच्चों में राम बसे हैं
ये ही अपने किशन कन्हाई ।
इन बच्चों में काबा-काशी
और नहीं है तीरथ है भाई ।
०००००००००००००००
खेल-गीत -
अक्कड़-बक्कड़
अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो
आसमान में बादल सौ ।
सौ बादल हैं प्यारे
रंग हैं जिनके न्यारे ।
हर बादल की भेड़ें सौ
हर भेड़ के रंग हैं दो ।
भेड़ें दौड़ लगाती हैं
नहीं पकड़ में आती हैं ।
बादल थककर चूर हुआ
रोने को मज़बूर हुआ ।
आँसू धरती पर आए
नन्हें पौधे हरषाए ।
अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो
आसमान में बादल सौ ।
सौ बादल हैं प्यारे
रंग हैं जिनके न्यारे ।
हर बादल की भेड़ें सौ
हर भेड़ के रंग हैं दो ।
भेड़ें दौड़ लगाती हैं
नहीं पकड़ में आती हैं ।
बादल थककर चूर हुआ
रोने को मज़बूर हुआ ।
आँसू धरती पर आए
नन्हें पौधे हरषाए ।
Sunday, March 25, 2007
आस न छोड़ो;हरे राम ‘समीप’
हरे राम ‘समीप’
मुश्किल आई है
तो क्या
वह भी जल्दी हट जाएगी
घुप्प अँधेरे कमरे में यूँ
मुश्किल ओढ़े
अवसादों से
घिरे हुए तुम
घबराए-से
क्यों बैठे हो!
ज़रा टटोलो
दीवारों को
उम्मीदों की अँगुलियों के
कोमल ज़िन्दा इन पोरों से
आहिस्ता-आहिस्ता खोजो
हाथों से दीवार न छोड़ो ।
कमरे की इन दीवारों में
कोई खिड़की निश्चित होगी
जिसके बाहर
बाँह पसारे,स्वागत करने
नई रोशनी मिल जाएगी
जुगनू होंगे , दीपक होगा
चाँद –सितारे कुछ तो होंगे
सूरज भी आ ही जाएगा
आस न छोड़ो ।
मुश्किल में तुम
आस न छोड़ो ।
(मैं अयोध्या…संग्रह से साभार)
Monday, March 19, 2007
आज का चिन्तन
बीमार सोचबीमार सोच को ढोने वाले लोग हर क्षेत्र में मिल जाएँगे ।सुबह जागकर अख़बार में चोरी ,डकैती ,हत्या ,लूट ,दुर्घटना की ख़बर तलाश करना ; दिन भर ऐसी ख़बरों के वर्णन में अपनी सारी ताकत झोंक देना कुछ लोगों का शगल बन गया है ।दूसरी श्रेणी में वे भले लोग हैं ;जो बुरी ख़बर को ‘आज का चिन्तन’ की सुबह ही सुबह परिचितों को सुनाएँगे ।उस समय उनकी मुखमुद्रा एक सुलझे हुए सन्त जैसी लगेगी ।वे अपनी बात के कुप्रभाव से पूरी तरह निरीह रूप से अनजान होते हैं ।इसी तरह की नकारात्मक सोच हमारे शिक्षा –जगत् की भी सबसे बड़ी खामी है । ऐसा तभी होता है ;जब व्यक्ति अपने वर्तमान से ऊपर नहीं उठ पाता है ,अपने अतीत से मुक्त नहीं हो पाता है ।आने वाले समय के लिए न योजना बना सकता है ,न उन्हें लागू करने का ख़तरा उठा सकता है ।अपने अतीत के प्रक्षेपण से पूरे भविष्य को आच्छादित करना चाहता है । अपनी नकारात्मक सोच से पूरे विश्व को नरक बनाने का उद्यम ज़रूर कर लेता है ; लेकिन छोटे –से प्रयास से फूल देने वाला का एक पौधा लगाने में अपना अपमान समझने लगता है । ऐसे बीमार लोग इस देश में बहुतायत से पाए जाते हैं । हंगामा और हड़ताल करने में ज़मीन -आसमान के कुलाबे मिला सकते हैं। घण्टों बेकार की बातों पर बहस कर सकते हैं ,कुतर्क की कीचड़ में गोता लगा सकते हैं ;लेकिन सड़क पर घायल पड़े आदमी को अस्पताल नहीं पहुँचा सकते ।ज्ञान को कैद करके कालकोठरी में डाल सकते हैं,उजाले के पैरों में बेड़ी पहना सकते हैं ;परन्तु उजाले को बेरोकटोक बाहर नही जाने देंगे ।इन बीमार सोच वाले लोगों ने भावी पीढ़ी का जीवन बहुत कठिन कर दिया है। निरन्तर नया सोचने वालों और करने वालों को कदम –कदम पर प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है अपनी कुण्ठा को छात्रों पर लादना कायरता ही नहीं वरन् अपने सामाजिक दायित्वों की उपेक्षा है ।इसका कुप्रभाव निकट भविष्य में शिक्षा-जगत को प्रभावित किए बिना नही रहेगा ।
बीमार सोच वाले लोग हमारे किशोरों को क्या देंगे ? हताशा निराशा और कुण्ठा के सिवाय शायद ही कुछ दे पाएँ । यदि हमें इनका भविष्य बचाना है तो सकारात्मक सोच को बढ़ावा देना पड़ेगा ।प्रयास करना होगा कि स्वस्थ मानसिकता वाले लोग ही शिक्षा के क्षेत्र में आएँ । युवा पीढ़ी के सामने सबसे बड़ा संकट आदर्श का है । शिक्षक अगर उनका आदर्श बनने में असमर्थ है तो फिर इस दायित्व को कौन सँभालेगा ? संभवत कोई नहीं ।आस्था और निर्माण की विचारधारा रखने वाले लोग भारत के भविष्य का निर्माण करने के लिए आगे आएँ ;तभी यह नई पीढ़ी सही दिशा में आगे बढ़ सकेगी । निदा फाज़ली के शब्दों में कहें तो यह समीचीन होगा :-
‘घर से मस्ज़िद है बहुत दूर तो चलों यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए ।’
बीमार सोच वाले लोग हमारे किशोरों को क्या देंगे ? हताशा निराशा और कुण्ठा के सिवाय शायद ही कुछ दे पाएँ । यदि हमें इनका भविष्य बचाना है तो सकारात्मक सोच को बढ़ावा देना पड़ेगा ।प्रयास करना होगा कि स्वस्थ मानसिकता वाले लोग ही शिक्षा के क्षेत्र में आएँ । युवा पीढ़ी के सामने सबसे बड़ा संकट आदर्श का है । शिक्षक अगर उनका आदर्श बनने में असमर्थ है तो फिर इस दायित्व को कौन सँभालेगा ? संभवत कोई नहीं ।आस्था और निर्माण की विचारधारा रखने वाले लोग भारत के भविष्य का निर्माण करने के लिए आगे आएँ ;तभी यह नई पीढ़ी सही दिशा में आगे बढ़ सकेगी । निदा फाज़ली के शब्दों में कहें तो यह समीचीन होगा :-
‘घर से मस्ज़िद है बहुत दूर तो चलों यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए ।’
Sunday, March 18, 2007
सम्पर्क-सूत्र
आप अपनी रचनाएँ यूनिकोड में(यूनिकोड सुविधा न होने पर कृतिदेव या शुषामें) टाइप कराकर निम्नलिखित पते पर ई मेल कर सकते हैं।किसी प्रकार के मानदेय की व्यवस्था नहीं है। रचना मौलिक होनी चाहिए । नकारात्मक सोच की रचना न भेजें ।
rdkamboj@gmail.com
rdkamboj@gmail.com
मेरी पसन्द
पूर्णिमा वर्मन के नवगीतमर्मस्पर्शी किन्तु सहज-सरल भाषा में अपनी बात कहना सबसे कठिन काम है । भाषा की लम्बी साधना से ही यह सिद्धि प्राप्त हो सकती है ।जीवन की जटिलताओं को आत्मीय भाव से हृदय तक पहुँचाना इस आपाधापी के युग में तो और भी असाध्य है । पूर्णिमा वर्मन ऐसा नाम है जो आज रची जा रही कविताओं में पूरी ऊष्मा के साथ अपनी छाप छोड़ने में सक्षम है । ‘यह हुई न कविता’बरबस ही पाठक कह उठेगा ।पाठक –प्रिय साहित्य ही लोकप्रिय हो सकता है ।जो गिने-चुने लोगों के लिए लिख रहें हैं ,उनकी रचनाएँ या तो पाठयक्रम मे जुड़कर विद्यार्थियों में अरुचि पैदा कर सकती हैं या पुस्तकालयों की अल्मारियों की शोभा बढ़ाकर कालान्तर में दीमकों का आहार बन सकती हैं । पूर्णिमा वर्मन की रचनाएँ www.anubhuti-hindi.org पर देखी जा सकती हैं।-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ .
Thursday, March 15, 2007
इंसान की बातें
इंसान की बातें
आदमी को चुभ रही इंसान की बातें ।
आज लगती तीर –सी ईमान की बातें ॥
जो किनारों पर रहे तूफ़ान के डर से ।
आज वे करने लगे तूफ़ान की बातें ॥
हर दिन बाज़ार में काम उनका बेचना ।
हर जगह भाती उन्हें दूकान की बातें ॥
जो अर्से तक रहे यहाँ अर्दली बनकर ।
आज वे करने लगे पहचान की बातें ॥
भूख से दम तोड़ती चिथड़ों बँधी गठरी ।
पेट क्या उसका भरें भगवान की बातें ॥
यार से पूछी कुशल घर –गाँव की हमने ।
उसने कही लाश की ,किरपान की बातें ॥
………………
आदमी को चुभ रही इंसान की बातें ।
आज लगती तीर –सी ईमान की बातें ॥
जो किनारों पर रहे तूफ़ान के डर से ।
आज वे करने लगे तूफ़ान की बातें ॥
हर दिन बाज़ार में काम उनका बेचना ।
हर जगह भाती उन्हें दूकान की बातें ॥
जो अर्से तक रहे यहाँ अर्दली बनकर ।
आज वे करने लगे पहचान की बातें ॥
भूख से दम तोड़ती चिथड़ों बँधी गठरी ।
पेट क्या उसका भरें भगवान की बातें ॥
यार से पूछी कुशल घर –गाँव की हमने ।
उसने कही लाश की ,किरपान की बातें ॥
………………
Monday, March 12, 2007
मैं घर लौटा,
बहुत मैं घूमा पर्वत -पर्वत
नदी घाट पर बहुत नहाया
और पिया तीरथ का पानी
आग नहीं मन की बुझ पाई।
बहुत नवाया मैंने माथा
मंदिर और मजारों पर भी
खोज न पाया अपने मन का चैन जरा भी ।
रेगिस्तानों में चलाकर के
दूर गया मैं सूनेपन तक
आग मिली बस आग मिली थी।
मैं लौटा सब फ़ेंक फान्काकर
भगवा चोला और कमंडल
और खोजने की बेचैनी
उन सबको जो नहीं पास थे
पहले मेरे।
मैं घर लौटा।
आकर बैठा था आंगन में
टूटी खटिया पेड नीम का
बिटिया आयी दौदी दौदी
दुबकी गोदी में वह आकर
पत्नी आयी सहज भाव से
और छुआ मुझको धीरे से।
बरस पडी जैसे शीतलता
और चांदनी भीनी भीनी
मेरे छोटे से आंगन में ।
मैं मूरख था ,
अब तक भटका
आग नहीं मन की बुझ पाई।
बहुत नवाया मैंने माथा
मंदिर और मजारों पर भी
खोज न पाया अपने मन का चैन जरा भी ।
रेगिस्तानों में चलाकर के
दूर गया मैं सूनेपन तक
आग मिली बस आग मिली थी।
मैं लौटा सब फ़ेंक फान्काकर
भगवा चोला और कमंडल
और खोजने की बेचैनी
उन सबको जो नहीं पास थे
पहले मेरे।
मैं घर लौटा।
आकर बैठा था आंगन में
टूटी खटिया पेड नीम का
बिटिया आयी दौदी दौदी
दुबकी गोदी में वह आकर
पत्नी आयी सहज भाव से
और छुआ मुझको धीरे से।
बरस पडी जैसे शीतलता
और चांदनी भीनी भीनी
मेरे छोटे से आंगन में ।
मैं मूरख था ,
अब तक भटका
बाहर-बाहर।
झाँक न पाया था भीतर मैं
पावन मन्दिर , तीर्थ जहाँ था
और जहाँ थे ऊँचे पर्वत
शीतल शीतल ,
और भावना की नदियाँ थीं
कलकल करती
छल छल बहती।
झोंके खुशबू के
भरे हुए थे , बात बात में।
जुड़े हुए थे हम सब ऐसे
नाखून जुड़े हो
साथ मांस के
युगों युगों से ।
>>>>>>>>>>>>>>>>>>
जरूरी है
जीवन के लिए जरूरी है
थोडी़ - सी छाँव
थोडी़- सी धूप।
थोडी़ - सा प्यार
थोडी़- सा रूप।
जीवन के लिए जरूरी है…
थोडा़ तकरार
थोड़ी मनुहार।
थोड़े -से शूल
अँजुरीभर फूल।
जीवन के लिए जरूरी है…
दो चार आँसू
थोड़ी मुस्कान।
थोड़ी - सा दर्द
थोड़े------- से गान।
जीवन के लिए जरूरी है…
उजली- सी भोर
सतरंगी शाम।
हाथों को काम
तन को आराम।
जीवन के लिए जरूरी है…
आँगन के पार
खुला हो द्वार।
अनाम पदचाप
तनिक इन्तजार।
जीवन के लिए जरूरी है …
निन्दा की धूल
उड़ा रहे मीत।
कभी कभी हार
कभी कभी जीत।
>>>>>>>>>>>>>>>>>>>
झाँक न पाया था भीतर मैं
पावन मन्दिर , तीर्थ जहाँ था
और जहाँ थे ऊँचे पर्वत
शीतल शीतल ,
और भावना की नदियाँ थीं
कलकल करती
छल छल बहती।
झोंके खुशबू के
भरे हुए थे , बात बात में।
जुड़े हुए थे हम सब ऐसे
नाखून जुड़े हो
साथ मांस के
युगों युगों से ।
>>>>>>>>>>>>>>>>>>
जरूरी है
जीवन के लिए जरूरी है
थोडी़ - सी छाँव
थोडी़- सी धूप।
थोडी़ - सा प्यार
थोडी़- सा रूप।
जीवन के लिए जरूरी है…
थोडा़ तकरार
थोड़ी मनुहार।
थोड़े -से शूल
अँजुरीभर फूल।
जीवन के लिए जरूरी है…
दो चार आँसू
थोड़ी मुस्कान।
थोड़ी - सा दर्द
थोड़े------- से गान।
जीवन के लिए जरूरी है…
उजली- सी भोर
सतरंगी शाम।
हाथों को काम
तन को आराम।
जीवन के लिए जरूरी है…
आँगन के पार
खुला हो द्वार।
अनाम पदचाप
तनिक इन्तजार।
जीवन के लिए जरूरी है …
निन्दा की धूल
उड़ा रहे मीत।
कभी कभी हार
कभी कभी जीत।
>>>>>>>>>>>>>>>>>>>
3 -बहता जल
हम तो बहता जल नदिया का
अपनी यही कहानी बाबा।
ठोकर खाना उठना गिरना
अपनी कथा पुरानी बाबा।
कब भोर हुई कब साँझ हुई
आई कहाँ जवानी बाबा।
तीरथ हो या नदी घाट पर
हम तो केवल पानी बाबा।
जो भी पाया, वही लुटाया
ऐसे औघड, दानी बाबा।
अपने किस्से भूख प्यास के
कहीं न राजा रानी बाबा।
घाव पीठ पर , मन पर अनगिन
हमको मिली निशानी बाबा।
>>>>>>>>>>>>>>>
हम तो बहता जल नदिया का
अपनी यही कहानी बाबा।
ठोकर खाना उठना गिरना
अपनी कथा पुरानी बाबा।
कब भोर हुई कब साँझ हुई
आई कहाँ जवानी बाबा।
तीरथ हो या नदी घाट पर
हम तो केवल पानी बाबा।
जो भी पाया, वही लुटाया
ऐसे औघड, दानी बाबा।
अपने किस्से भूख प्यास के
कहीं न राजा रानी बाबा।
घाव पीठ पर , मन पर अनगिन
हमको मिली निशानी बाबा।
>>>>>>>>>>>>>>>
Sunday, March 11, 2007
कविता
।
!
बेटियों की मुस्कान
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
बेटियों की मुस्कान –
जैसे गूँज उठा
भोर में साम -गान ,
जैसे वन में तिरती
बाँसुरी की तान ,
जैसे भरी दुपहरी में
बरगद की छाया
जैसे लू के बाद
बह उठी शीतल बयार ।
मत छीनो यह मुस्कान
इसके छिन जाने पर -
रूठ जाएँगी ॠचाएँ ,
डूब जाएँगे सातों स्वर ,
रूठ जाएगी शीतल छाया ,
बयार बनेगी
अंगारों की बौछार
झुलस जाएगी सारी सृष्टि ।
-0-
!
बेटियों की मुस्कान
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
बेटियों की मुस्कान –
जैसे गूँज उठा
भोर में साम -गान ,
जैसे वन में तिरती
बाँसुरी की तान ,
जैसे भरी दुपहरी में
बरगद की छाया
जैसे लू के बाद
बह उठी शीतल बयार ।
मत छीनो यह मुस्कान
इसके छिन जाने पर -
रूठ जाएँगी ॠचाएँ ,
डूब जाएँगे सातों स्वर ,
रूठ जाएगी शीतल छाया ,
बयार बनेगी
अंगारों की बौछार
झुलस जाएगी सारी सृष्टि ।
-0-
Monday, March 5, 2007
Sunday, March 4, 2007
परिचय
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
जन्म : 19 मार्च 1949 , ग्राम हरिपुर , तहसील बेहट , जि0 सहारनपुर (उ0प्र0)
शिक्षा : एम0 ए0 (हिन्दी ) मेरठ विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में(प्राइवेट),बी0 एड्0 ।
प्रकाशित रचनाएँ : माटी ,पानी और हवा ,अँजुरी भर आसीस ,कुकड़ू कूँ ,हुआ सवेरा
( कविता संग्रह)
धरती के आँसू ,दीपा , दूसरा सवेरा( लघु उपन्यास )
असभ्य नगर (लघुकथा संग्रह ),खूँटी पर टँगी आत्मा (व्यंग्य संग्रह)
अनेक संकलनों में लघुकथाएँ संकलित ।गुजराती ,पंजाबी ,उर्दू एवं नेपाली में अनूदित । ‘कवि के चगुल में’-नाटक (आकाशवाणी जबलपुर से प्रसारित)
प्रसारण : आकाशवाणी गुवाहाटी ,नज़ीबाबाद , रामपुर , अम्बिकापुर,एवं जबलपुर के केन्द्रों से कविताएँ ,व्यंग्य ,वार्त्ताएँ ,परिचर्चाएँ प्रसारित।
लघुकथा के क्षेत्र में कई पुरस्कार प्राप्त।
हिन्दी के कई शिविरों में निदेशक के रूप में कार्य ।सम्प्रति : प्राचार्य , केन्द्रीय विद्यालय आयुध उपस्कर निर्माणी हज़रतपुर जि0 फ़िरोज़ाबाद (उ0प्र0 ) 283103
जन्म : 19 मार्च 1949 , ग्राम हरिपुर , तहसील बेहट , जि0 सहारनपुर (उ0प्र0)
शिक्षा : एम0 ए0 (हिन्दी ) मेरठ विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में(प्राइवेट),बी0 एड्0 ।
प्रकाशित रचनाएँ : माटी ,पानी और हवा ,अँजुरी भर आसीस ,कुकड़ू कूँ ,हुआ सवेरा
( कविता संग्रह)
धरती के आँसू ,दीपा , दूसरा सवेरा( लघु उपन्यास )
असभ्य नगर (लघुकथा संग्रह ),खूँटी पर टँगी आत्मा (व्यंग्य संग्रह)
अनेक संकलनों में लघुकथाएँ संकलित ।गुजराती ,पंजाबी ,उर्दू एवं नेपाली में अनूदित । ‘कवि के चगुल में’-नाटक (आकाशवाणी जबलपुर से प्रसारित)
प्रसारण : आकाशवाणी गुवाहाटी ,नज़ीबाबाद , रामपुर , अम्बिकापुर,एवं जबलपुर के केन्द्रों से कविताएँ ,व्यंग्य ,वार्त्ताएँ ,परिचर्चाएँ प्रसारित।
लघुकथा के क्षेत्र में कई पुरस्कार प्राप्त।
हिन्दी के कई शिविरों में निदेशक के रूप में कार्य ।सम्प्रति : प्राचार्य , केन्द्रीय विद्यालय आयुध उपस्कर निर्माणी हज़रतपुर जि0 फ़िरोज़ाबाद (उ0प्र0 ) 283103
Saturday, March 3, 2007
नवगीत (navgeet)
नवगीत
गाँव अपना
पहले इतना
था कभी न
गाँव अपना
अब पराया हो गया ।
खिलखिलाता
सिर उठाए
वृद्ध जो, बरगद
कभी का सो गया ।
अब न गाता
कोई आल्हा
बैठकर चौपाल में
मुस्कान बन्दी
हो गई
बहेलिए के जाल में
अदालतों की
फ़ाइलों में
बन्द हो ,
भाईचारा खो गया ।
दौंगड़ा
अब न किसी के
सूखते मन को भिगोता
और धागा
न यहाँ
बिखरे हुए मनके पिरोता
कौन जाने
देहरी पर
एक बोझिल
स्याह चुप्पी बो गया।
>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>
2 - उदास छाँव
नीम पर बैठकर नहीं खुजलाता
कौआ अब अपनी पाँखें
उदास उदास है अब
नीम तले की शीतल छाँव ।
पनघट पर आती
कोई राधा
अब न बतियाती
पनियारी हैं आँखें
अभिशप्त से हैं अधर
विधुर-सा लगता सारा गाँव।
सब अपने में खोए
मर भी जाए कोई
छुपकर निपट अकेला
हर अन्तस् रोए
चौपालों में छाया
श्मशानी सन्नाटा
लगता किसी तक्षक ने
चुपके से काटा ,
ठिठक ठिठक जाते
चबूतरे पर चढ़ते पाँव ।
न जवानों की टोली
गाती कोई गीत
हुए यतीम अखाड़े
रेतीली दीवार- सी
ढह गई
आपस की प्रीत
गली- गली में घूमता
भूखे बाघ -सा अभाव ।......................
3 -दिन डूबादिन डूबा
नावों के
सिमट गए पाल।
खिंच गई नभ में
धुएँ की लकीर
चढ़ गई
तट पर
लहरों की पीर
डबडबाई
आँख- सा
सिहर गया ताल ।
थककर
रुक गई
बाट की ढलान ,
गुमसुम
सो गया
चूर चूर गान
हिलते रहे
याद के
दूर तक रूमाल ।
गाँव अपना
पहले इतना
था कभी न
गाँव अपना
अब पराया हो गया ।
खिलखिलाता
सिर उठाए
वृद्ध जो, बरगद
कभी का सो गया ।
अब न गाता
कोई आल्हा
बैठकर चौपाल में
मुस्कान बन्दी
हो गई
बहेलिए के जाल में
अदालतों की
फ़ाइलों में
बन्द हो ,
भाईचारा खो गया ।
दौंगड़ा
अब न किसी के
सूखते मन को भिगोता
और धागा
न यहाँ
बिखरे हुए मनके पिरोता
कौन जाने
देहरी पर
एक बोझिल
स्याह चुप्पी बो गया।
>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>
2 - उदास छाँव
नीम पर बैठकर नहीं खुजलाता
कौआ अब अपनी पाँखें
उदास उदास है अब
नीम तले की शीतल छाँव ।
पनघट पर आती
कोई राधा
अब न बतियाती
पनियारी हैं आँखें
अभिशप्त से हैं अधर
विधुर-सा लगता सारा गाँव।
सब अपने में खोए
मर भी जाए कोई
छुपकर निपट अकेला
हर अन्तस् रोए
चौपालों में छाया
श्मशानी सन्नाटा
लगता किसी तक्षक ने
चुपके से काटा ,
ठिठक ठिठक जाते
चबूतरे पर चढ़ते पाँव ।
न जवानों की टोली
गाती कोई गीत
हुए यतीम अखाड़े
रेतीली दीवार- सी
ढह गई
आपस की प्रीत
गली- गली में घूमता
भूखे बाघ -सा अभाव ।......................
3 -दिन डूबादिन डूबा
नावों के
सिमट गए पाल।
खिंच गई नभ में
धुएँ की लकीर
चढ़ गई
तट पर
लहरों की पीर
डबडबाई
आँख- सा
सिहर गया ताल ।
थककर
रुक गई
बाट की ढलान ,
गुमसुम
सो गया
चूर चूर गान
हिलते रहे
याद के
दूर तक रूमाल ।
>>>>>>>>>>>>
4-इस शहर मेंपत्थरों के
इस शहर में
मैं जब से आ गया हूँ ;
बहुत गहरी
चोट मन पर
और तन पर खा गया हूँ ।
अमराई को न
भूल पाया
न कोयल की ॠचाएँ ;
हृदय से
लिपटी हुई हैं
भोर की शीतल हवाएँ ।
बीता हुआ
हर एक पल
याद में मैं पा गया हूँ ।
शहर लिपटा
है धुएँ में ,
भीड़ में
सब हैं अकेले ;
स्वार्थ की है
धूप गहरी
कपट के हैं
क्रूर मेले ।
बैठकर
सुनसान घर में
दर्द मैं
सहला गया हूँ ।
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