पथ के साथी

Saturday, January 20, 2024

1396

 

1- कुछ याद आया ?

भीकम सिंह

 


बाईं  आँख फड़की

कोई करता रहा इंतजार

कुछ याद आया

पूछ रहा है मन । 

 

वो गुलमोहर वाली गली

ठोकर खाते पाँ

कुछ याद आया

पूछ रहा है मन ।

 

जब स्नेह- भरे हाथ

खड़ी कर गए दीवार

कुछ याद आया

पूछ रहा है मन 

 

स्पंदित रहा हफ्तों तक

खिला हुआ गुलमोहर

कुछ याद आया

पूछ रहा है मन।

 

एक लम्बी हँसी जब

खिड़की पर टूट गिरी

कुछ याद आया

पूछ रहा है मन।

 

जब होने लगे तनाव

और चिंघाड़े कोई आवाज़

तब याद कर लेना

सोच रहा है मन।

-0-

2- संध्या- दीप

अनिता मंडा

 


 

अमलतास सी दमकती उम्र में

प्रेम हिंडोले पर बैठे प्रेमी

नहीं लुभाते मुझे उतना

 

जितना लुभाते हैं वे

बिन बुलाए मेहमान से 

आ बैठे बुढापे की आव भगत करते

सुंदरता में चार चाँद लगाते

एक दूसरे का हाथ थामें

साथ- साथ नदी सी बही उम्र में भीगे हुए

अमावस रात में तज़ुर्बों के जुगनू से चमकते

 

उदासियों के बदले गिरवी रखी मुस्कुराहटें

गुल्लक फोड़ निकालते

साँझ के दीपक से 

साथ- साथ जलते

चलते

बहते

पुरवाई से छूकर

सारी थकन को भूलते

कितने सुंदर लगते हैं

संध्या समय से दीप

मधुर मधुर जलते।

-0-

3- क्या बचा पाओगे कल?

 गौतमी पाण्डेय

 


शुद्ध वायु, शुद्ध जल,

क्या बचा पाओगे कल?

गर रहा जारी ये छल,

सोच लो बस एक पल।

नैनो को हरियाली,

चित्त को चैन।

अनवरत उपलब्ध हैं,

हो दिन या,

हो फिर रैन।

मन को सुकून,

फेफड़ों को हवा।

क्षुधा को भोजन,

रुग्ण को दवा।

जो मुफ्त है और प्राप्त है,

अक्सर वही अज्ञात है!

अभिशप्त ना कर दो उसे,

जो मिल रही सौगात है।

बिना कुछ दिए,

बिना कुछ माँगे।

मिला है सब कुछ,

बिना कुछ त्यागे।

मानव हो तो यह मान लो,

हो दृढ़प्रतिज्ञ, अब ठान लो।

प्रत्यक्ष को पहचान लो,

विध्वंस का संज्ञान लो!

कर्तव्य अपना जान लो,

दायित्व अपना पूर्ण कर

सम्मानितों! सम्मान लो।

सम्मानितों, सम्मान लो।

ई-मेल-gautmipandey@gmail.com

 

 

 

 

Thursday, January 18, 2024

1395-बाल कविता

 अनिता मंडा

 चाचा चौधरी

 


साथ रहे जब चाचा के साबू

आते हैं फिर किसके काबू

 

कम्प्यूटर से तेज चला है

ऐसा ग़ज़ब दिमाग़ मिला है

 

चाचा पहनें वास्कट, पगड़ी

लाल रंग की लगती तगड़ी

 

साथ रखें हैं पॉकेट घड़ी

प्यारी सी जादू भरी छड़ी

 

चाचा भी तो ख़ूब चटोरे

भर खाएँ तरबूज कटोरे

 

चाची के बेलन के आगे

गुमसुम गुपचुप चाचा भागे

 

पोल्का डॉट की पहने साड़ी

कभी सयानी कभी अनाड़ी

 

चाची का किरदार भला है

सबको दिल से प्यार मिला है

 

बीनी चाची चाहे कंगन

जग घूमे करता उनका मन

 

चालबाज ठग चोर लुटेरे

आम आदमी को जब घेरे

 

तब उनको व्यवहार सिखाते

नैतिकता का पाठ पढ़ाते

 

ताक़त में साबू का सानी

नहीं मिलेगा है हैरानी

 

साबू को जब गुस्सा आता

ज्वालामुखी कहीं फट जाता

 

साबू भागे पहने कच्छा

लगे पायजामा भी अच्छा

 

दाबू ने दी कुंडल बाली

साबू ने कानों में डाली

 

ढेर चपाती और तरकारी

साबू के खाने की तैयारी

 

चाचा-चाची को काँधे पर

साबू सैर करा आता घर

 

साबू का दुश्मन है राका

छिप छिप कर डाले वो डाका

 

दूध मिले, रॉकेट मटकता

झट-झट बाउल भरा गटकता

 

टिंगू मास्टर दिल बहलाये

तरकीबों से काम बनाये।

 

काम चुटकियों में सब  होते

बच्चे पढ़-पढ़ कर ही सोते

 

बच्चों का परिवेश बनाया

कितना सुंदर देश बनाया

 

बचपन की हैं याद दिलाते

पचपन में भी हैं मन भाते

 

प्राण पदम् श्री प्राण निराले

कितने किस्से हैं रच डाले

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Monday, January 1, 2024

1393

 

नववर्ष गीत

डॉ. सुरंगमा यादव

 


प्राची में सूरज की लाली

देखो कैसी छटा निराली!

नव आलोक हृदय में भर ले

जग री आली जग री आली !

नैना जागे मन है उनींदा

जैसे बादल जल से रीता

नवचेतनता मन में भर ले

अलस त्यागकर अब तो आली !

जीवन पल-छिन बीता जाता

पल में क्या से क्या हो जाता

रूठे सजन मनाकर हँस ले

पीछे मत पछताना आली!

जो पतझर से घबराएगा

गीत वसंती क्या गागा

टूटे तारों को उठ कस ले

राग नया फिर गा ले आली!

बिछड़ गया जो साथी पथ में

साथ न तेरे चल पागा

निज पलकों की नमी छिपाकर

तुझको हँसना होगा आली !

 

Sunday, December 24, 2023

1392-थरथराती पलकों का मौन


रश्मि 'लहर'

  


अचानक 

एक खिलखिलाती स्मृति 

पूरे दिवस पर छाने लगी! 

यथार्थ की व्यथाओं को

दुलराने लगी।

 

मन संशय में रहा.. 

अश्रुबिंदु उलझने लगे!

असंख्य पुराने पल

तुम्हारी बाहों से गुजरने लगे।

 

एक जीवन्त मिलन

अनुभूति की जकड़न से

बाहर आने का

असंयत प्रयास करने लगा।

 

जाने क्यों

विकल वर्तमान का 

कठोर चेहरा 

अतीत के मुलायम वक्ष को

खोजने लगा।

 

चिंतन के अबोध अधरों को

थरथराने से

रोकने लगा।

 

वो प्रकंपित प्रथम मिलन की 

अजनबी ऑंखें!

वो असहज- सी

अतृप्त बातें!

 

कितने सुव्यवस्थित ढंग से

जीवन को सँजो लेती हैं न?

 

पर

 

जब-तब लुढ़का देती हैं

समय के कपोल पर

इक्का-दुक्का आँसू! 

 

उफ़! 

ये प्रेम भी न..

कमजोर करता जाता है 

विस्मरण की अजूबी डोर को! 

 

दृढ़ करता जाता है 

अनाम बन्धन के 

हर छोर को!

 

सुनो! 

एक अपूर्ण!

रहस्यमय सा..

अपरिचित स्वप्न!

क्या तुमने भी देखा है?

 

क्या अपने बँधे-बँधे हाथों में 

दुबारा मिलने की 

कोई अटूट रेखा है?

-0-

रश्मि 'लहर'

इक्षुपुरी कॉलोनी, लखनऊ उत्तर प्रदेश

मोबाइल -9794473806