पथ के साथी

Thursday, January 18, 2024

1395-बाल कविता

 अनिता मंडा

 चाचा चौधरी

 


साथ रहे जब चाचा के साबू

आते हैं फिर किसके काबू

 

कम्प्यूटर से तेज चला है

ऐसा ग़ज़ब दिमाग़ मिला है

 

चाचा पहनें वास्कट, पगड़ी

लाल रंग की लगती तगड़ी

 

साथ रखें हैं पॉकेट घड़ी

प्यारी सी जादू भरी छड़ी

 

चाचा भी तो ख़ूब चटोरे

भर खाएँ तरबूज कटोरे

 

चाची के बेलन के आगे

गुमसुम गुपचुप चाचा भागे

 

पोल्का डॉट की पहने साड़ी

कभी सयानी कभी अनाड़ी

 

चाची का किरदार भला है

सबको दिल से प्यार मिला है

 

बीनी चाची चाहे कंगन

जग घूमे करता उनका मन

 

चालबाज ठग चोर लुटेरे

आम आदमी को जब घेरे

 

तब उनको व्यवहार सिखाते

नैतिकता का पाठ पढ़ाते

 

ताक़त में साबू का सानी

नहीं मिलेगा है हैरानी

 

साबू को जब गुस्सा आता

ज्वालामुखी कहीं फट जाता

 

साबू भागे पहने कच्छा

लगे पायजामा भी अच्छा

 

दाबू ने दी कुंडल बाली

साबू ने कानों में डाली

 

ढेर चपाती और तरकारी

साबू के खाने की तैयारी

 

चाचा-चाची को काँधे पर

साबू सैर करा आता घर

 

साबू का दुश्मन है राका

छिप छिप कर डाले वो डाका

 

दूध मिले, रॉकेट मटकता

झट-झट बाउल भरा गटकता

 

टिंगू मास्टर दिल बहलाये

तरकीबों से काम बनाये।

 

काम चुटकियों में सब  होते

बच्चे पढ़-पढ़ कर ही सोते

 

बच्चों का परिवेश बनाया

कितना सुंदर देश बनाया

 

बचपन की हैं याद दिलाते

पचपन में भी हैं मन भाते

 

प्राण पदम् श्री प्राण निराले

कितने किस्से हैं रच डाले

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Monday, January 1, 2024

1393

 

नववर्ष गीत

डॉ. सुरंगमा यादव

 


प्राची में सूरज की लाली

देखो कैसी छटा निराली!

नव आलोक हृदय में भर ले

जग री आली जग री आली !

नैना जागे मन है उनींदा

जैसे बादल जल से रीता

नवचेतनता मन में भर ले

अलस त्यागकर अब तो आली !

जीवन पल-छिन बीता जाता

पल में क्या से क्या हो जाता

रूठे सजन मनाकर हँस ले

पीछे मत पछताना आली!

जो पतझर से घबराएगा

गीत वसंती क्या गागा

टूटे तारों को उठ कस ले

राग नया फिर गा ले आली!

बिछड़ गया जो साथी पथ में

साथ न तेरे चल पागा

निज पलकों की नमी छिपाकर

तुझको हँसना होगा आली !

 

Sunday, December 24, 2023

1392-थरथराती पलकों का मौन


रश्मि 'लहर'

  


अचानक 

एक खिलखिलाती स्मृति 

पूरे दिवस पर छाने लगी! 

यथार्थ की व्यथाओं को

दुलराने लगी।

 

मन संशय में रहा.. 

अश्रुबिंदु उलझने लगे!

असंख्य पुराने पल

तुम्हारी बाहों से गुजरने लगे।

 

एक जीवन्त मिलन

अनुभूति की जकड़न से

बाहर आने का

असंयत प्रयास करने लगा।

 

जाने क्यों

विकल वर्तमान का 

कठोर चेहरा 

अतीत के मुलायम वक्ष को

खोजने लगा।

 

चिंतन के अबोध अधरों को

थरथराने से

रोकने लगा।

 

वो प्रकंपित प्रथम मिलन की 

अजनबी ऑंखें!

वो असहज- सी

अतृप्त बातें!

 

कितने सुव्यवस्थित ढंग से

जीवन को सँजो लेती हैं न?

 

पर

 

जब-तब लुढ़का देती हैं

समय के कपोल पर

इक्का-दुक्का आँसू! 

 

उफ़! 

ये प्रेम भी न..

कमजोर करता जाता है 

विस्मरण की अजूबी डोर को! 

 

दृढ़ करता जाता है 

अनाम बन्धन के 

हर छोर को!

 

सुनो! 

एक अपूर्ण!

रहस्यमय सा..

अपरिचित स्वप्न!

क्या तुमने भी देखा है?

 

क्या अपने बँधे-बँधे हाथों में 

दुबारा मिलने की 

कोई अटूट रेखा है?

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रश्मि 'लहर'

इक्षुपुरी कॉलोनी, लखनऊ उत्तर प्रदेश

मोबाइल -9794473806

Saturday, December 23, 2023

1391-पद्म प्रतिमा (सॉनेट)

 मूल रचयिता (ओड़िआ) - इं. विष्णु साहू 

 अनुवाद - अनिमा दास, कटक, ओड़िशा 

स्वर्णिम तनु की चंद्रकिरण में तरल लास्य कर द्रवित

चिरयौवना तुम कर कामना की शिखा प्रज्जलित

मुकुलित हो तुम किसी मंजरी वन में.. हे, अभिसारिका!

नहीं हूँ कदापि भ्रमित कि भिन्न है तुम्हारी भूमिका।

 

चारण कवि की चारु कल्पना तुम तरुण तरु की छाया

नृत्यशाला की मृण्मयी हो तुम मग्नमृदा की माया

तिमिर-तट की शुक्र तारिका तुम हो मुक्ता कुटीर की  

मंजुल तुम्हारे देह-देवालय जैसे अग्नि में ज्योति सी।

 

जिसके हृदय में नहीं रही कभी कोई प्रेयसी-रूपसी 

उसे नहीं है ज्ञात कि किस सुधा से पूर्ण है काव्यकलशी 

हे,मधुछंदा! तुम्हारी सुगंध से सुगंधित मेरी नासा

मन में भर दी है तुमने भावपूरित तरल काव्यभाषा।

 

तुमने किया है परिपूर्ण  जीवन-पात्र मेरा.. हे,परिपूर्णा!

नयन में नृत्य करती छलहीन तुम्हारी पद्म प्रतिमा।

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