पथ के साथी

Friday, February 16, 2018

799


1-ट्यूलिप -कृष्णा वर्मा

तुम्हारे दिव्य रूप के मोहपाश में
बँधने से नहीं बच पाई मैं
ख़रीद ही लिया दस डालर में
तुम्हें चंद रोज़ पहले
अपने कमरे की कुर्सी के ठीक सामने
खिड़की के नीचे पड़ी मेज़ पर सजा दिया
भोर की किरणें रोज़ खिड़की से उतर
तुम्हारा मुख चूम ऊर्जित करती हैं तुम्हें
तुम्हें सरसता देख हुलस उठता है मेरा मन
पल-पल नेह-भरे जल से
सींचती है तुम्हें मेरी दृष्टि
इंतज़ार है तो केवल तुम्हारे खिलने का
अनायास एक सुबह तुम्हें विकसित हुआ देख
नाच उठा मेरा मन
तुम्हें यूँ मुसकुराता देख लगा
ज्यों हो कोई मेरा सगा सहोदर
हँसना-खिलखिलाना तो यूँ भी आजकल
किताबी शब्द हो कर रह गए हैं
या यूँ समझो कि आदतन ही अब
आत्मलीन होने लगे हैं सब
कितने मोहक हो तुम मेरी कल्पना से परे
चटक लाल रंग निखरा-निखरा यौवन
कोमलता ऐसी की निगाह फिसल जाए
तुम्हारा दिपदिपाता रूप देख
पगलाने लगती है मेरी ख़ुशी
और मुस्कुराहटें बैठने लगती हैं
मेरे होंठों की मुँडेर पर
बोलने लगा हैं
अनायास संवादों का मौन
तुम तो मेरी रूह की ख़ुराक बन गए हो
सच में तुम्हारी उपस्थिति ने
नया विस्तार दे डाला है मेरी सोच को
कभी-कभी इस कटु सत्य को सोच
सहसा काँपने लगता है मन कि
जब तुम खोने लगोगे अपना अस्तित्व
और क्षीण होने लगेगा तुम्हारा लावण्य
अपने ही हाथों काट डालूँगी तुम्हें तेज़ धार कैंची से  
और फेंक दूँगी इसी खिड़की से बाहर
फिर से माटी में माटी होने को ।

-0-
2-मन है तू कौन- कृष्णा वर्मा

तुझे चंट- चपल या कहूँ मौन
इतना अनगढ़ तुझे पढ़े कौन
देह भीतर तू फिर तीतर तू
तू बंजारा नहीं नियत स्थान
तू खड़ा मिले हर शहर गाँव
कितना चाहा मिल जाए पता
ना जान सकी तेरा कौन धाम
पर्वत सा खड़ा कभी हिम-सा ढला
कभी श्याम वर्ण घन -सा गरजा
कभी कोमल बूँदें बन बरसा
गति थामें कभी कभी द्रुतगामी
तेरा नाम है मन करे मनमानी
फुदके चिड़िया -सा यहाँ-वहाँ
गिलहरी -सा उछले ठाँव-ठाँव
कभी डाल-डाल कभी पात-पात
तुझे पकड़ सकूँ रही प्यासी आस
तुझे ढूँढने को मथ लिया सागर
फिर भी ना रीति इच्छा- गागर
मिला सृष्टि में ना तेरा होना
अंतस् का टोहा कोना-कोना
भीतर तू बंद फिर तू स्वच्छंद
तू उड़ा फिरे ज्यों नभ पतंग
तेरे पकड़ने को हारे मेरे यतन
जपे लाखों मंत्र किए कितने हवन
मैंने इतना ही है जाना तुझे
खड़ा मूक मौन तू कुतरे मुझे
छलिया तू कौन तुझे पढ़े कौन
तू ही बतला मन है तू कौन।
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3-बँटवारा -प्रियंका गुप्ता 

चलो,
बाँट लेते हैं आधा आधा
मेरे हिस्से का प्यार तुम रख लेना
तुम्हारे हिस्से का ग़म
मैं आँचल में बाँध लूँगी;
सफ़र तो लंबा होगा-
साथ चलते हुए
थक जाएँ जब कदम,
या फिर
थमने लगें जज़्बात
फिर से कर लेंगे बँटवारा-
अपने हिस्से की यादें लेकर
मैं रुक जाऊँगी,
अपने हिस्से का वक़्त लेकर
तुम आगे चल देना...।
-0-

Wednesday, February 14, 2018

798


यह कैसा अस्तित्व?
डॉ.कविता भट्ट

स्वप्निल निशा सोती आँखें
देख रही थी सोच रही थी मैं

कुछ गतिशील होता जीवन मेरा भी
परिभाषित होता नाम मेरा भी
किनारे लुढ़कते पत्थरों को ठोकरें मारती
दिख गया मन्दिर एक तभी
चढ़ी सीढ़ियाँ पार कीं
भटकती रही बड़ी देर यूँ ही
अँधियारी-सी एक मूरत दिखी तभी
किन्तु यह क्या?
मूरत एकाकी, खण्डित और अधूरी
सम्भवतः नर के साथ नहीं थी नारी
शंकर के साथ नहीं थी शक्ति या गौरी
बस सभी पूज रहे थे मात्र ‘गौरी-शंकर‘
गौरी पहले पीछे शंकर
पर यह क्या मूरत तो बस शिव की

तो फिर प्रश्न उठा मेरे मन में
कि यह कैसा अस्तित्व गौरी का?
तो फिर क्या हो सकता था
मुझ-सी साधारण नारी का
-0-

Saturday, February 3, 2018

797


बसंत
डा.सुरेन्द्र वर्मा
1
डालियों से हरे पत्ते झाँकते हैं
बच्चे किलकारते हैं
धन्य हैं बड़े बूढ़े
दरख़्त के नीचे, इनकी खातिर
जिन्होंने वैराग्य ले लिया
लो बसंत आ गया
2
औचक ही आ जाता है बसंत
पूरी प्रकृति ही बदल जाती है
यकायक
ऐसे में कब
कौन-सी उत्कंठा जाग जाए
पता नहीं चलता!
काम का सहचर है बसंत
पलाश में लगी आग
तपाती है तन
अधीर कर जाती है हमारा मन
कोरे कागज़ पर, बस
तुम्हारा ही नाम है–बसंत
3
ओ बसंत
तुम संत कब से हो गए?
दिन में कमल
और महकाकर बेला रात में
निहाल किया माधवी को तुमने
अपनी मादक बयार से उसे
बदनाम किया दिग्-दिगंत
ओ बसंत
तुम संत कब से हो गए.
4
पत्ता पत्ता खिल उठा बसंत में
प्रकोप शीत का
मजबूर हुआ बसंत में!
वय: संधि की आहट
नीम-ठंडक
और ग्रीष्म की गुनगुनाहट
बचपन की विदाई
और यौवन की दस्तक
स्वाभिमान में उठा मस्तक
कुंठा रहित उल्लास है
विकुंठ का आनंद भाव है
ग्रंथियों से मुक्ति पा
मन उदात्त है
पता पत्ता पुष्प हुआ बसंत में
5
डालियों पर अटकी
पीली पत्तियाँ झरीं
धूलि के बगूले उठे
खड़क उठे पात
नीम के, पीपल के.
बासंती हवाओं में
भटकता रहा पतझर
इधर उधर।
खिल उठीं कलियाँ गुलाब
महक उठा गंध राज
जंगल जंगल लद गया
लाल फूलों से पलाश।
पत्ता पत्ता झड गया
जगह देकर दूसरों को।
कहीं स्वागत गान
तो कहीं मर्सिया
जीवन और मरण बीच
सिर्फ एक बारीक रेख
देख पतझड़–बसंत देख

—१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड
इलाहाबाद-२११००१

Sunday, January 28, 2018

795


बसंत        
पुष्पा मेहरा

उतरी ओढ़नी धुंध की
निखरा  रूप धरा का
डाल-डाल पर खिल गईं  कलियाँ
नव जीवन मुस्काया,
रंग मन में भर आया  

फूल–फूल पर किरण नाचती
हवा सुखद मनभावन बहती
राग-रंग से भर कर उड़ती
रंगीं पाखों की टोली ,
प्रेम-रंग में भीगी छतरी
गुलमोहर ने तानी ,
रोम–रोम हरषाया
सखि ! बसंत आया ।

अमलतास ने माँगी हल्दी
पीताम्बर रंग लाया
लो बसंत आया ।

बूट–बाल की झाँझ बज उठी
खेतों ने भी झूम-मल्हार गाया,
तान मदिर भौरों ने छेड़ी
अम्बर भी मुस्काया
मन झूम–झूम हरषाया
लो ! अनंगआया ।

हवा रच रही छंद मधुर
मन धरती का डोला
फूले पलाश की चितवन से
नशा निराला छाया
काम ने मन में राग भर दिया
मन विरही-दहकाया
सखि!बसंत आया ।

आमों की डालों पर
सजे देख बौरों के झूमर
कोकिल विरही कूका,
पा सुगंध भरा झोंका
पात–पात बौराया
देख के,मन हरषाया
सखि!बसंत आया ।

शीत के आँसू पोंछ बसंत
प्रीति की रीति निभाता
फ़गुआ गाता,विरहा गाता
रंगों के डोल बहाता
प्रकृति-नूर रंग लाया
देखो फिर बसंत आया । 
 -0-
Pushpa.mehra @gmail.com


Saturday, January 27, 2018

794


1- कुण्डलिया
ज्योत्स्ना प्रदीप

सरहद के उस पार पर ,बड़ा अजब है फाग ।
होली खेले रात दिन ,मन में लेकर आग।।
मन में लेकर आग ,बहा रंग अनूठे।
छ्लनी बैरी-देह, वतन की खुशियाँ लूटे ।।
विजय घोष के संग ,मात का दिल है गदगद।
लिखती है नव गीत ,हमारी प्यारी 'सरहद' ।।
-0-
2-हरियाणा साहित्य अकादमी-परिष्कार  कार्यशाला के विद्यार्थी
1-पूनम
1
दरमियाँ सब ही दिलों के, फ़ासले से है कई,
सत्य है सदियों पुराना, बात ना कोई नई,
प्रश्न है अब एकता का, और ना कोई भी जवाब,
माँगता है वक्त हमसे, गुज़रे लम्हों का हिसाब।

था कभी ऐसा ज़मी पर, धर्म था ना जात थी,
प्रेम ही था एक नारा, साथ की ही बात थी,
प्रेम ही इक मूल था, ना विद्वत्ता का था नकाब
माँगता है वक्त हमसे.....

टूटती- सी जा रही, विश्वास की अब हर कड़ी,
बढ़ रहा है भेद ही, अब इस ज़मी पर हर घड़ी,
ना रही इंसान में, इंसानियत की कोई आब
माँगता है वक्त हमसे.....

चाहतों की भीड़ में ही, छिप गई खामोशियाँ,
जिस्म में ही दब गई है, रूह की अब सिसकियाँ,
बह रहा तन्हाइयों का, अब यहाँ रग में सैलाब,
माँगता है वक्त हमसे.....

हम चले जो खुद को फिर, वक्त भी दोहराएगा,
मोतियों की माल सा, राष्ट्र ये बंध जाएगा
नहीं रहेगा धड़कनों पे, दासता का अब हिजाब
माँगता है वक्त हमसे.....

-0-648/2 दयाल सिंह कॉलोनी, नज़दीक अलमारी फैक्टरी, सिसाय रोड़, हांसी- 125033-0-
-0-
2-माहिया-राहुल लोहट
1
माला क्यों जपता है
मन्दिर ना मालिक
वो तन में बसता है।
2
महफिल खिल जाएगी
चलकर तो देखो
मंजिल मिल जाएगी।
3
ना धन ना माया में
सुख बस मिलता है
अपनों की छाया में।
4
वो बात निराली है
अपने बचपन की
सौगात निराली है।
5
अब सुख की बारी है
हिम्मत के आगे
हर मुश्किल हारी है।
6
दु:ख सुख में ढलता है
रात अगर है तो
दीपक भी जलता है।
7
भँवरे जैसे जीना
खींच रिवाजों से
मानवता रस पीना।
8
तुम मान कहो इनको
बेटी है बेटी
मत दान कहो इनको।
9
खुशबू में खोया हूँ
धरती माता के
कदमों में सोया हूँ।
10
माटी ये चन्दन है
मेरी धरती माँ
चरणों में वन्दन है।
-0- राहुल लोहट
गांव -खरड़वाल,तहसील-नरवाना ,जिला -जीन्द
Email--wrrahulkumar@gmail.com