पथ के साथी

Sunday, November 20, 2016

688



1-प्यार की बातें करें
डॉ योगेन्द्र नाथ शर्मा अरुण

आइए कुछ प्यार की बातें करें।
बेवजह क्यों मौत से पहले मरें।
हौंसले  मन में सलामत हैं अगर,
आइए,क्यों मुश्किलों से हम डरें।
ये आँधियाँ, तूफ़ान आएँगे जरूर,
हौंसले सब के दिलों  में हम भरें।
ये अँधेरे खुद-ब-खुद मिट जाएँगे,
आइए,अब रौशनी बन हम झरें।
कोई आए या न आए मदद को,
'
अरुण' सबके वास्ते अब हम ढरें।
  
  -0-पूर्व प्राचार्य,74/3,न्यू नेहरू नगर,रुड़की-247667

2-बिछुआ उसके पैर का
डॉ. कविता भट्ट 
(दर्शन शास्त्र विभाग,हे०न० ब० गढ़वाल विश्वविद्यालय,श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड)

प्रेम भरे दिनों की स्मृतियों में खोया हुआ, जब प्रिय था उसके संग टहलता हुआ
कांच-बर्फ के फर्श पर सर्द सुबहें लिये, काँपता ही रहा मैं सिर के बल चलता हुआ
जेठ की धूप में गर्म श्वांसें भरते हुए, एक-एक बूँद को रहा तरसता जलता हुआ
हूँ गवाह- उसके पैरों की बिवाइयों का, ढलती उम्र की उँगलियों से फिसलता हुआ
सिमटा हुआ सा गिरा हूँ- आहें लिये, सीढ़ीनुमा खेत- किसी मेड पर सँभलता हुआ
ढली उम्र; लेकिन मैं बिछुआ- उसके पैर का अब भी हूँ; पहाड़ी नदी- सा मचलता हुआ
रागिनी छेड़कर रंग सा बिखेरकर; कुछ गुनगुनाता हूँ अब भी पहाड़ सा पिघलता हुआ
वृक्षों के रुदन सा भरी बरसात में; आपदा के मौन का वीभत्स स्वर निगलता हुआ
मैं हराता गया- ओलों-बर्फ को, तपन-सिहरन को, अंधियारी गर्त से निकलता हुआ
चोटी पे बज रही धुन मेरे संघर्ष की, गाथाओं के गर्भ में मेरा संकल्प पलता हुआ
-0-
3 –परिवेश
सत्या शर्मा कीर्ति

शाम की बेला
गंगा का किनारा
अनगिनत प्रज्वलित दीए
पवित्र धूप की खुशबू
घण्टियों की मधुर धुन
आरती का सस्वर गान,
अनायास ही मन हो जाता है
सात्विक
जुड़ जाते हैं हाथ
झुक जाते हैं सर
किसी ने नहीं कहा तुम ऐसा करो
पर
स्वतः होता है सब कुछ
हमारे अंदर का देवत्व
उस परमपिता के आगे हो जाता है
नतमस्तक
अर्थात हम बुरे या अच्छे
नहीं हैं
हमारा परिवेश करता हैं
हमारा निर्माण
और हमारे संस्कारों का
परिष्कार
-0-

Satyaranchi732@gmail.com
4- एक नाज़ुक थी कली
श्वेता राय

एक नाज़ुक थी कली वो।
झर गई है अधखिली जो।
मन कनक सम वो सुहाई।
माघ में जब गोद आई।
उर्मियों से दीप्ति लेकर,
जग हृदय पर खूब छाई।
श्वास में सबके घुली वो।
झर गई है अधखिली जो।।
थी प्रथम कुरुक्षेत्र में वो।
नेह रखती नेत्र में वो।
छू गई सोपान पहला,
रुग्णता के क्षेत्र में वो।
चाँदनी मधु से जली वो।
झर गई है अधखिली जो।
मलयनिल जब बह रही थी।
ताप वो अति सह रही थी।
जूझती थी आस से पर
मृत्यु उसको गह रही थी।
हाथ नियति के तुली वो।
झर गई है अधखिली जो।
सेज पर लेटी सुहागन।
स्वप्न दृग में भर सुहावन।
बन गई निष्ठुर जगत से,
छोड़ कर सुत एक पावन।
मोड़ मुँह सबसे चली वो।
झर गई है अधखिली जो।
-0-

Tuesday, November 15, 2016

687



1-बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज...
डॉ जेन्नी शबनम 

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है,   
दो पल चैन से सो लूँ मैं भी   
क्या उसका मन नहीं करता है?   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

देस -परदेस भटकता रहता   
घड़ी भर को नहीं ठहरता है,   
युगों से है वो ज्योत बाँटता   
मगर कभी नहीं वह घटता है!   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

कभी गुर्राता कभी मुस्काता   
खेल धूप-छाँव का चलता है,   
आँखें बड़ी-सी ये मटकाता   
जब बादलों में वह छुपता है!   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

कभी ठंडा कभी गरम होता   
हर मौसम-सा रूप धरता है,   
शोला-किरण दोनों बरसाता   
मगर ख़ुद कभी नहीं जलता है!   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

जाने कितने ख्वाब सँजोता   
वो हर दिन घर से निकलता है,   
युगों-युगों से खुद को जलाता   
वो सबके लिए ये सहता है!   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है !   
-0-
2- बचपन- मंजूषा मन  
बाबू जी से
नज़रें बचाकर,
चुपके से अम्मा
रख देती थी
हथेली पर
पाँच पैसे का सिक्का,
उस सिक्के को ले
इठलाते हुए
दौड़ते फिरते थे
सारे गाँव में हम....
आज अफसर कहलाकर भी
अम्मा का दिया
वो सिक्का
बहुत याद आता है
बचपन के दिन भी
क्या अमीरी के दिन थे।
-0-

Wednesday, November 9, 2016

686



1-दोहा
मंजूषा मन
1
गौरैया उड़ जा अभी, बुरे हुए हालात।
आ जाना उस रो जब, बीते दुख की रात।।
-0-
2-राख
मंजूषा मन
कुरेदते रहे
मुद्दतों तक
रिश्तों पर जमी राख,
इसी उम्मीद में
कहीं शायद बची होगी
थोड़ी सी आँच
थोड़ी तपन....

जितना टटोला,
जितना खोला
यही पाया
हरबार
कि बुझ चुकी थी आग
लम्बे अरसे से,
बच रही थी
सिर्फ और सिर्फ राख...
जो उड़ -उड़कर
ढकती रही चेहरे के रंग
बनाती रही सब कुछ
बदरंग।

अब जुटाने होंगे
नये साधन
फिर सुलगाने के लिए
एक नई आग।
-0-
3-अपने हिस्से का अमृत
कृष्णा वर्मा

भीतर की बारादरी में भटकती
बेस्वाद कसैली यादों का बोझ
उनींदी रातें खिंडता सुकून
और लम्बी सूनी दोपहरियाँ
आठों पहर - इस बिन्दु के आस-पास
चकरघिन्नी सी घूमती
थक गई है ज़िंदगी - इस व्यवसाय से।
साय की तरह साथ चलती मेरी तन्हाई
और चिन्दी-चिन्दी होता मेरा मन
शून्य में टटोलता है नित कुछ नया
मेरी ग़ैरत मेरी खुद्दारी
फड़फड़ा रही है घायल पंछी -सी
और मैं ! तड़ से पड़े तमाचे के ताप से
तमतमाई गाल- सी खड़ी हूँ स्तब्ध
बहुत हुआ नहीं सह पाऊँगी और
काटनी ही है अब मुझे
अपने संस्कारों से जुड़ी
परम्पराओं की नाल
पैरों की गति के आड़े आती
यह रुनझुनाती साँकलें
नहीं चाहिए मुझे अब जीने को
तुमसे उधार की साँसें
बंद करो अब तुम -खेलना यह चौसर
क्योंकि नहीं लगना मुझे
अब तुम्हारे दाव पर
पाना है मुझे मेरी मुठ्ठी में बंद
अब मेरा अपना सूरज
सिरजना है अब अपने ही ढंग से
मुझे अपना वजूद
आसमाँ की अलगनी पर
टाँग कर अपनी नाम पट्टी
गढ़्नी है मुझे एक अद्भुत पहचान
ताकी लौटा सकूँ तुम्हें सूद समेत
तुम से ही मिली जीवन भर की तमाम पीड़ाएँ
तुम्हारे भ्रम को बल क्या देती रहीं
मेरी मिथ्या मुसकाने
तुम ने तो यूँ समझ लिया कि
वाकिफ हो गए तुम मेरी नस-नस से
सुनो-तुम अपने रुतबे में ऐसे अंधे हुए
यह तक ना जान पाए कि कब
अपने हिस्से का अमृत
पीने की ठान ली मैंने।
-0-