पथ के साथी

Monday, August 17, 2015

संशय



इन्दु

शाम की इस ठंडी आग में

बुझते दिए को जलाए हूँ,

जब भी रोशनी खोने लगता है

उसे गरम हवा के छींटे देती हूँ;

पर शायद ये जानता है

इस ठंडी आग के साए में

इसे उम्र भर जलना है;

हर नई छींटे के साथ

फिर जल उठता है

एक नई आशा और

उमंग मन में  संजोये.

गूगल से साभार

आशा का यह बुझता दिया

तुमसे कहता है,

कोई एहसान न करना;

रना इस ठण्डे तूफ़ान में

यह अंतिम  साँस भरेगा......

शब्दों के इन जंजालों में

गहरा भेद छिपा है

खुद ही नहीं समझ पाती

मैं क्या हूँ? क्यों हूँ? कौन हूँ?
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परिचय-इन्दु
शिक्षा: एम. ए. समाजशास्त्र, बी.एड.
सृजन-लेख रचना, कविता रचना 
निवास-गुड़गाँव                    
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Sunday, August 16, 2015

मन -देहरी



1-कमला निखुर्पा

1
जब भी बिखरा
बाहर नीम अन्धेरा।
नेह से भरा
मेरे नैनों का दिया।
जल उठी फिर से
तेरी यादों की बाती
जगमग हुई
मन -देहरी।
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2-रामेश्वर काम्बोज हिनांशु
1
तेरी मुस्कान ने सींचा
जीवन का हर उजेरा
कि हारकर मुँह छुपा भागा
घेरे था जो अँधेरा ।
मन को जब-जब तुमने छुआ
हर छुअन बन गई दुआ।
यादें तेरी आरती के
दीपक- सी जलती रहीं,
सँजोकर तुम्हें प्राण -सी
युगों तक पलती रहीं।
पावन उर में क्या बसा!
मैं सारे सुख पा गया।
जब-जब गंगा नहाना था
द्वार तुम्हारे आ गया ।
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3-गुंजन अग्रवाल

1
भजो सदा अनादि नाम शक्ति रूप वन्दना ।
हरो त्रिलोक नाथ क्लेश कष्ट दुःख क्रंदना ।।
वृषांक देह नीलकण्ठ शुभ्रता उपासना ।
सदा करो कृपा प्रभो करूँ अनंत अर्चना ।।
2
त्रिशूल हाथ रुद्रदेव उग्र रूप क्यों धरे ।
नमो नमामि शक्तिनाथ वंदना सदा करें ।।
बिसारि भूल भक्त देव पाप ताप हो हरें ।
अनंत रौद्र रूप देख दैत्य है सभी डरें ।।
3
अनंग सर्वशक्तिमान कंठ सर्प है सजे ।
त्रिनेत्र रूप माथ  चंद्र गंग धार है धजे ।।
त्रिशूल हाथ वामअंग अम्बिका-हिये सजे ।
उपासना करे अनाथ भक्त मन्त्र है भजें ।।
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4-अनिता मण्डा

ये गेहूँ की बालियाँ
बाजरे के सिट्टे
दुआ में उठे हुए
जमीं के हाथ जैसे ....
औलाद अगर
भूखी हो तो
माँ को नींद
नहीं आती है....
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