पथ के साथी

Friday, December 17, 2021

1167-हम... तुम... मैं

 

हम... तुम... मैं

अनिमा दास (कटक, ओड़िशा)

  


नदी के इस तट पर हम... उस तट पर प्रेम...धूल से भरा

अस्तमित सूर्य... अरुणाभ...एवं कोमल स्पर्श स्वर्णिम वीची का

इस तट पर दो उदास प्रतिछवियाँ...बिंबित अल्प श्याम-जल पर

दोनों की अँजुली में श्वेत पुष्प एवं विस्तारित आंशिक कुहर।

 

आकाश की सीमा बढ़ती जा रही थी देहद्वय को छूते हु

मौनता थी उस तट पर भी...हमें नहीं था जाना भूलते हु

उड़ते पंखों की पीठ पर रखकर अतीत की स्मृतियों को...

नहीं छूना था...नहीं छूना था वर्तमान को एवं नीतियों को...

 

वाहित हो रही थी सांध्य द्युति में एक रिक्त कहानी

गोलाकार परिधि में भर रहा था उमस एवं श्वास अभिमानी

"कहो!" कहकर उद्विग्न हुईं उर्मियाँ कि सिक्त हुआ दृगंचल

आकाश के आलिंगन में मेघों का अवकुंचन व स्पर्श तरल

 

 

नदी के इस तट पर कोई चिह्न नहीं..किंतु वह तट हुआ तमस्वी

'हम' हुआ पृथक...'तुम' के भग्नावशेष में 'मैं' रहा बन तपस्वी ।

Thursday, December 16, 2021

1166

 1-सपना 

भीकम सिंह 

 


ना मैं साहिर
 

ना इमरोज़ 

पर ढूँढता हूँ 

हर रोज 

ख्वाबों में 

ख्यालों में 

अमृता  -

उसका सागर 

जहाँ वह

डूबने की हद

पार कर गई 

 

प्रेम के शब्द 

और

उनकी खुशबू 

मर्यादा के अर्थों को 

देकर

नई जुस्तजू

पुराने-से 

पड़ गए 

रिश्तों में 

नये आयाम 

धर गई 

 

मैं 

आसक्ति को ओढ़े 

सोच रहा था 

तट पर बैठे 

तभी एक

उच्छृंखल-सी लहर

पहने हुए 

दोपहर 

टूट कर गिरी 

और

तर कर गई 

-0-

2-अलसाई सुबह

 अंजू खरबंदा



आज का दिन

कुछ आलस से भरा है

आलस थोड़ा तन का

आलस थोड़ा मन का

जिंदगी के चलते रहेंगे लफड़े ।

 

देह चाहती आज आराम

जी नही करूँ कुछ काम

अलसाई-सी सुबह

पड़ी हूँ निष्प्राण

बिस्तर पर आलस से जकड़े ।

 

आज अच्छा लग रहा है

बिखरा घर

फैले कंबल

सलवटों से भरी चादर

कुरसी पर रखे बिन तह किए कपड़े ।

 

टेबल पर रखा चाय का कप

खुला अखबार

नि:शब्द डायरी का पन्ना

मुस्कुराता हुआ पेन

अंजुम त्याग दिए आज सारे पचड़े 

-0-

Thursday, December 9, 2021

1165

 क्षणिकाएँ- प्रो. विनीत मोहन औदिच्य

1


ईश्वरीय सत्ता
के

समानांतर

खुली हुईं

धर्म के ठेकेदारों की दुकानें

बेचती हैं आस्था

2

सहलाती हैं पीठ

एक दूसरे के विरुद्ध करके

विष- वमन

विरोधाभासी

खुरदरी जिह्वाएँ

3

खा जाने को आतुर

घूरती कई जोड़ी आँखें

करती है सर्वत्र पीछा

असहज नारी देह का

4

बस्ते के बोझ तले

कराहते शैशव का

मौन प्रतिकार

अनसुना कर देती हैं

महत्वाकांक्षाएँ

5

बनकर मठाधीश

साहित्य का

निरंतर करते हैं

चीरहरण

अंधों में काने राजा

6

मानव के हाथों

होकर पूर्णतः अपमानित

मचा रही चहुँ ओर

हाहाकार

निर्वस्त्र रोदन करती प्रकृति

7

स्वार्थ की बलिवेदी

पर नित्य होते होम

जीवन मूल्यों को

टुकुर- टुकुर

ताकती हैं मौन

मानवीय संवेदनाएँ

8

निर्ममता से लील

रहीं है प्रतिदिन

दिशाहीन यौवन को

महत्त्वाकांक्षाओं की

प्रज्वलित भट्टियाँ

9

ओढ़ी हुई

शालीनता के मुखौटों से

मत होना तनिक भी भ्रमित

नहीं होता इनके

अंतस् से

मलिनता का निस्तार

10

विकलांग श्रद्धा

अंध भक्ति

व्यक्ति पूजा से ग्रस्त

चरण वंदना हेतु उद्यत

भीड़

रौंदती जा रही है

अनवरत

आत्मा जनतंत्र की

11

कृशकाय कंपित गात

भौतिक विलासिता में डूबी

संतति के समक्ष

विवश हो देखता

दम तोड़ते

अपने सपनों को

12

सहस्राधिक

बिच्छुओं के डंक- सा

दंश दे जाती हैं

परछाइयों- सी

गहराती अतीत की

स्मृतियाँ

13

नेहासक्ति का

पाकर खाद - पानी

फूटने लगे हैं

प्रेमांकुर

युगल हृदय की

अमराइयों में

14

नीले अंबर पर

लहराते कुंतलों -सी

उमड़ती मेघावरि

करे आँख- मिचौली

सजन भुवन भास्कर से

15

धर्म की तुला में संरक्षित

नित्य प्रति दिन

क्टोपस- सा

चारों ओर विस्तार पाता

जनसंख्या का घनत्व

मुँह चिढ़ा रहा है

विकास को

16

थरथराते अधरों पर

चुंबनों से कोमल स्पर्श की

मादकता जगाती

प्रथम अनुभूति से

कामनातुर

अर्ध उन्मीलित

रतनारे नयन

बोल उठते प्रेम की

मौन भाषा

17

अव्यक्त से व्यक्त होकर

पुनः अव्यक्त होने की

प्रक्रिया में जीव

विस्मृत कर

नश्वर जग यथार्थ

उलझता

मायावी प्रलोभनों की

शृंखलाओं में

18

कभी छूता है शिखर

कभी टूटता है दर्प

कदाचित् फिर भी

आने लगा है आनंद

मनुष्य को

साँप सीढ़ी के

खेल में

19

प्राची से उगकर

प्रतीची के आंचल में

छुपता रवि

नित्य देता मानो

सरल संदेश

उत्थान से पतन का

-0-

प्रो. विनीत मोहन औदिच्य

कवि, सोनेटियर एवं ग़ज़लकार

सागर, मध्य प्रदेश

Tuesday, December 7, 2021

1164

 डॉ.जेन्नी शबनम की क्षणिकाएँ

1.चाँद का दाग़

 


ऐ चाँद! तेरे माथे पर जो दाग़ है 

क्या मैंने तुम्हें मारा था

अम्मा कहती है -मैं बहुत शैतान थी 

और कुछ भी कर सकती थी। 

 

2- शगुन

 

हवा हर सुबह चुप्पी ओढ़ 

अँजुरी में अमृत भर 

सूर्य को अर्पित करती है 

पर सूरज है कि जलने के सिवा 

कोई शगुन नहीं देता।  

 

3- उजाला पी लूँ 

चाहती हूँ दिन के उजाले की कुछ किरणें

मुट्ठी में बंद कर लूँ
जब घनी काली रातें लिपटकर डराती हों मुझे
मुट्ठी खोल, थोड़ा उजाला पी लूँ
थोड़ी-सी, ज़िन्दगी जी लूँ।

 

4-शुभ-शुभ

 

हज़ारों उपायमन्नतेंटोटके 

अपनों ने किए ताकि अशुभ हो,  

मगर ग़ैरों की बलाएँपरायों की शुभकामनाएँ   

निःसंदेह कहीं तो जाकर लगती हैं 
वर्ना जीवन में शुभ-शुभ कहाँ से होता।  

 

5-स्त्री की डायरी

 

स्त्री की डायरी उसका सच नहीं बाँचती    

स्त्री की डायरी में उसका सच अलिखित छपा होता है  
इसे वही पढ़ सकता हैजिसे वो चाहेगी,   
भले ही दुनिया अपने मनमाफ़िक़  
उसकी डायरी में हर्फ़ अंकित कर ले।   

 

6- सुख-दुःख जुटाया है  
  

तिनका-तिनका जोड़कर सुख-दुःख जुटाया है   

सुख कभी-कभी झाँककर   

अपने होने का एहसास कराता है   

दुःख सोचता है कभी तो मैं भूलूँ उसे   

ज़रा देर वो आराम करे 
मेरे मायके की टिन की पेटी में।

-0-

Saturday, December 4, 2021

1163

 

 ज़िन्दगी- प्रीति अग्रवाल


ये नज़र, जाए जहाँ तक, सब धुँआ- सा लग रहा
इस शहर में, हर कोई, क्यों, लापता- सा लग रहा

खोए- खोए हैं सभी, हर शख़्स ही हैरान है
अमन ओ चैन का यहाँ, न नाम, और निशान है

शून्य आँखों में बसा है, सूरतों पर है थकान
दिल हैं झोंपड़ी से, आलिशान, ऊँचे हैं मकान

बेतहाशा दौड़ता, हर आदमी बेहाल है
बेलगाम ख़्वाहिशों का, यह सुनहरा जाल है

किस मोल पर है क्या मिला, ये सोचता, कोई नहीं
मंज़िलों की चाहतों में, खो रहे, खुद को सभी

यूँ तो सब के पास सब है, वक़्त की बस, है कमी
सांस केवल चल रही हो, ज़िन्दगी, ये तो नहीं

कल की रट में आदमी, है आज को झुठला रहा
जो भी है, बस आज है, न समझ, न समझा रहा

बेखबर को जब खबर होगी, कि जीवन क्यों मिला
सांझ करती होगी रस्ता, रात आने के लिए

इक दफा जो रात ने, अपना ठिकाना कर लिया
आएगा 'कल', या न आए, कोई न बतला सका

जो है तेरे पास, ले आनन्द, उसे सम्मान दे
'और' की रट छोड़, जो है, वो बहुत, ये मान ले

कल नहीं है, वो न आएगा कभी, तू जान ले
जो है केवल 'आज' ही है, जान और पहचान ले

कल की रट को छोड़, तू, इस दिन की डोरी थाम ले
जो है, वो ही है बहुत, इस बात को, तू मान ले!!

-0-

--

Friday, December 3, 2021

1162-तीन कविताएँ

1-शर्तों के कंधों पर-डॉ.सुरंगमा यादव

रत का हथियार दिखाकर
गीत प्रेम के गाते गाओ
हम बारूद बिछाते जाएँ
तुम गुलाब की फसल उगाओ
लपटों में हम घी डालेंगे
अग्नि- परीक्षा तुम दे जाओ
ठेकेदार हैं हम नदिया के
तुम  प्यास लगे कुआँ खुदवा
हम सोपानों पर चढ़ जाएँ
तुम धरती पर दृष्टि गड़ा
माला हम बिखराएँ तो क्या!
मोती तुम फिर चुनते जाओ
सिंहासन पर हम बैठेंगे
तुम चाहो पाया बन जाओ
फूलों पर हम हक रखते हैं
तुम काँटों से दिल बहलाओ
अधिकारों का दर्प हमें है
तुम कर्त्तव्य निभाते जाओ
करो शिकायत कभी कोई न
अधरों पर मुस्कान सजाओ
मन भरमाया,समझ न पाया

हम समझें कोई जतन बताओ
अब मत शर्तों के कंधों पर

संबंधों का बोझ उठाओ

-0-

 2-सविता अग्रवाल 'सवि' कैनेडा 

1

अनगढ़ी प्रणय की दीवार

टूटी साँसों की लड़ियाँ

मधु यामिनी के स्वप्न रीते

वंचना से, भाव भीगे

सूखे पड़े हैं सुमन सारे

प्रतिकार में वायु बही है

बहती नदी की तीव्र धारा

अभिशाप सिक्त

पथ रोके खड़ी है

2

यंत्रों की मची है दौड़

प्रतिस्पर्धा की होड़

अपनत्व हुआ लुप्त

खोया स्वर्णिम प्रकाश

अभिशप्त हो रहा

मानव अस्तित्व

पाने- खोने की ये

कैसी आँख- मिचौनी

जीवन बन गया है

करुणामय कहानी

-0-