पथ के साथी

Friday, August 5, 2016

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डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर

तारों की बारात नभ ,चंदा लेके आ गया।
जादू तेरे प्यार का, मन पे मेरे छा गया।।
मोर ,पपीहा खुश हुआ, कली खिली जब बाग में;
सुरभित मन्द हवा चली,भँवरा भी मँडरा गया।।
उमड़ी काली जब घटा, डाली-डाली झूमती ;
पानी बरसा ज़ोर से, मन-आँगन महका गया।।
घूँघट ओढ़े लाज का,करती हार शृंगार है;
रूप सिमटता देख के,दर्पण भी शरमा गया।।
चलती नाव खुमार में, हर्षित हरेक बाल है;
उन्नत भारत देश में,सावन खुशियाँ ला गया।।
परिवारों में सुख बढ़े, प्रेम-भाव सौगात दें;
दूर रहें तकरार से,सावन यह समझा गया।।
सावन के त्योहार में ,माँगें सबकी ख़ैर हम;
बोल पूर्णिमाबोलती,सावन सबको भा गया।।
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Sunday, July 24, 2016

650



1-सूना आशियाना
        -अनिता ललित 
 किस क़दर सूना हो जाता होगा 
उस चिड़िया का आशियाना …  
उड़ जाते होंगे जब 
उसके नन्हें-नन्हें बच्चे ,
अपने छोटे-छोटे पंख पसारकर ,
किसी नई दुनिया की ओर
अपनी नई पहचान बनाने।
शायद तभी
बुनती है वह, एक बार फिर,
एक नया नीड़ !
और नहीं लौटती
उस घर में अपने … 
कि गूँजती रहती हैं उसमें
यादों की मासूम किलकारियाँ
रीता हो जाने के बाद और भी ज़्यादा
बेपनाह, बेहिसाब … 
दिल को चीरती हुई।

और चलता रहता है ...
यही क्रम सिलसिलेवार। 
बनना, बिगड़ना, टूटना, फिर बनना
कि थकती नहीं वह !
टूटती नहीं वह !
सहते-सहते यह दर्द !
काश! सीख पाते हम इंसाँ भी !
इस दर्द के इक क़तरे को भी,  
दिल में उतारने का हुनर । 
सहते-सहते पीने,... 
पीते-पीते गुनगुनाने का फ़न !  
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 2-हार मानो न तुम
          -डा.मधु त्रिवेदी
गूढ़ रहस्य हमें यह पढ़ाने लगी
बात कोई पते की बताने लगी

गलतियों से सभी लोग लो सीख अब
हर कदम पर हमें यह सिखाने लगी

आसमाँ में पंखों को लगा कर उड़े
रोज सपने नये ही दिखाने लगी

प्यार का पाठ सबको पढ़ा रोज ही
हर सुबह शाम हमकों रिझाने लगी

हार मानो न तुम आज समझा रही
वो बना आज बच्चा हँसाने लगी
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Thursday, July 21, 2016

649



श्वेता राय के तीन गीत
भोर गीत
किरणें आकर भोर से, छेड़े मधुरित राग है।
मुदित हृदय यह देख के, गाये एक विहाग है।।

छूकर मलयागिरि पवन, खिलते सबके गात हैं।
पुलकित हो कर साथ में, हिलते सब तरू पात हैं।।
सुघर धरा के भाल पर, स्वर्णिम भोर सुहाग है।
मुदित हृदय यह देख के, गा एक विहाग है।।

पंछी के स्वर में बसी, बातें सब मन मीत की।
दूर्वा दल पर शोभती, पावस बूँदें प्रीत की।।
कण कण में बिखरा हुआ, द्रुम दल पुष्प पराग है।
मुदित हृदय यह देख कर, गाएक विहाग है।।

प्राची से जीवन जगे, जाये पश्चिम छोर तक।
प्रेम पथी बन प्रीत को, बिखरा चहुँ ओर तक।।
अलसा मन में भरे, रंगों का नित फ़ाग है।
मुदित हृदय यह देख कर, गा एक विहाग है।।

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2-बरसात, याद और तुम
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रिमझिम पलछिन गिर रही, बाहर ये बरसात है।
नयनो से भी झर रही, रिमझिम दिन औ रात है।।
आकुल मन आहें भरे, व्याकुळ होते प्राण है।
तेरी सुधि बन दामिनी, लेती मेरी जान है।।

पंकिल जीवन बन गया, प्रीत कुमुद की आस में।
चुपके से करुणा हँसे, दुख के इस परिहास में।।
पुरवाई की चोट से, शिथिल पड़ा ये गात है।
यौवन का दिन ढ़ल रहा, लम्बा जीवन रात है।।

आँसू बन भाषा गअधर चढ़ा इक मौन है।
जग में अब लगता नही, मेरा अपना कौन है।।
आ जाओ प्रिय आज तुम, पा जाऊँ मुस्कान मैं।
जीवन कुसुमित बाग़ की, बन जाऊँ पहचान मैं।।

घुल जायें स्वर कोकिला, धड़कन की हर बात में।
हरियाली दिन सब लगे, झूमे चंदा रात में।।
मन मयूर बन बावरा, खुशियाँ बाँधें पाँव में।
बीते जीवन प्रेम में, प्रीत भरी मधु छाँव में।।

आ जा रे साजना, सावन की बरसात में
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3-मेरी हो पहचान तुम

खिलते हिय के बाग़ में, सुमनों की मुस्कान तुम।
सपन सलोने प्रिय सुनो, मेरी हो पहचान तुम।।

सूना मन का था सदन, आये तुम मधु चाप से।
प्रेम पुजारी बने प्रिये, स्वप्न सजे दृग आप से।।
पूजा थाली थाम लिये, बन जग से अनजान तुम।
सपन सलोने प्रिय सुनो, मेरी हो पहचान तुम।।

मन के मरूथल में बही, प्रीत भरी रसधार है।
पतझड़ बीता, बाग़ अब, भ्रमरों से गुंजार है।।
साँसो से बँध बन गए, जीवन के अब मान तुम।
सपन सलोने प्रिय सुनो, मेरी हो पहचान तुम।।

हाथों में ले हाथ प्रिये, भूली सारे भार को।
अब कब चाहूँ गूँथना, पीड़ा आँसू हार को।।
डूबती जीवन नदी मैं, तिनका सम जलयान तुम।
सपन सलोने प्रिय सुनो, मेरी हो पहचान तुम।।

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श्वेता राय, विज्ञान अध्यापिका,पूर्व माध्यमिक विद्यालय
परसिया भंडारी,देवरिया,उत्तर प्रदेश
मोब 9044375683