पथ के साथी

Wednesday, February 11, 2026

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डॉसुरंगमा यादव की कविताएँ

 1 यूँ हीं न मिले कुछ 

 


फलक पर सितारे न यूँ ही सजे हैं

सिफ़र से शिखर तक जमाने लगे हैं

खुशियों का मौसम न यूँ ही मिला है

 बहुत पीर पर्वत उठाने पड़े हैं

 मखमल है पाँव के नीचे न यूँ ही

 धूप में पाँव अरसा तपाने पड़े हैं

 वक्त लिख रहा है जिनकी इबारत

 उन्हें वक्त से ज़ख़्म खाने पड़े हैं

किसी से मिली है    सौगात कोई

 उन्हें रास्ते खुद बनाने पड़े हैं।

 -0-

2-कर दूँ अर्पण

 

तेरे सपनों को निज पलकें दे दूँ

तेरी अभिलाषाओं को निज मन दे दूँ तेरे आँसू को निज दामन दे दूँ

तेरे पथ के काँटों को निज पाँव दे दूँ

कुछ चाहूँ, कुछ माँगूँ, तुझको अपना दे दूँ कण- कण

तेरी उड़ानों को मैं अपना साहस दे दूँ

तेरे सिर की धूप को अपना साया दे दूँ

तेरी ख़ामोशी को अपने गीत मैं दे दूँ

तेरी उलझन को मैं अपना मस्तक दे दूँ

खुद को रिक्त बनाकर, सब मनचाहा तुझको कर दूँ अर्पण।

 

 

4 comments:

  1. संघर्ष के बाद ही सफलता का स्वाद आस्वादन करने को मिलता है। सुंदर भाव रचे हैं सुरँगमा जी। बधाई।

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  2. प्रेम में समर्पण, अर्पण की भावना कितनी बलवती होती है कि सब प्रिय पर लुटाकर रिक्त हो जाना कितना सहज हो जाता है। बहुत सुंदर कविता।

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  3. बहुत ही सुन्दर... 👏🏻👏🏻🙏🏻

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  4. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति । सुदर्शन रत्नाकर

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