पिता, माँ और रोने की भाषा/ डॉ. पूनम चौधरी
घर में
दो दर्शन थे
एक पिता
दूसरी
माँ।
पिता —
व्यवस्था थे।
अनुशासन,
संयम,
और वह चुप्पी
जो अपेक्षित थी पुरुषों से,
पिता कहते थे—
पुरुष अगर रोए
तो समय को असहज कर देता है,
और समय
कभी भी असहज पुरुषों को माफ़ नहीं करता।
उन्होंने सिखाया,
सुख सार्वजनिक है दुख निजी
वे तार्किक थे इसलिए
जानते थे
दुनिया सवाल नहीं पूछती,
हिसाब माँगती है।
और हिसाब देते वक़्त
आँसू
गिनती बिगाड़ देते हैं
उनकी बातों में
अनुभव था।
तर्क था
वे जानते थे
कि आँसू
तर्क को कमज़ोर कर देते हैं
और कमज़ोर तर्क
भीड़ में
कुचल दिए जाते हैं।
माँ बताती थी—
रोना भाषा का सबसे पुराना रूप है।
जब शब्द थक जाते हैं
तो आँसू
बोलने लगते हैं।
मन अगर भर जाए
तो उसे खाली करना भी
ईश्वर की तरह ज़रूरी है।
माँ के पास
दुख को समझने का
कोई तर्क नहीं था,
बस दो बाँहें थीं
जो फैलते ही
दुनिया को छोटा कर देती थीं।
दोनों दर्शन घुले थे मेरे रक्त में
मैं अवसर अनुकूल आजमाता रहा
पिता के सामने
मेरे होंठ
हँसी का अभ्यास करते रहे—
एक सीधी रेखा,
जिसके नीचे
छुपा रहता
प्रभंजन भावनाओं का,
और माँ के कंधे पर
मेरा हृदय
एक टूटी हुई दीवार की तरह
ढह जाता
आँसू
क्रम से नहीं गिरते
वे गिरते रहते
जैसे कोई बाँध
तर्क से थककर
भावना के आगे
समर्पण कर दे।
मां जानती थी
आंसुओं का मूल्य
पिता दूर से करते रहे आकलन
हँसी को
समझते रहे,
ताकत
उन्हें पता नहीं चला
कि यह हँसी
रोने का
सबसे सभ्य अनुवाद थी।
अब समझ आता है—
पिता ने मुझे
दुनिया से लड़ना सिखाया,
माँ ने
खुद से।
और इसलिए
मैं आज भी
भीड़ में हँसता हूँ—
ताकि पिता
मेरे भीतर
अडिग रहें।
और
एकांत में रोता हूँ—
ताकि माँ
मुझसे
कभी विदा न हों।
-0-

बहुत ही मार्मिक व हृदयस्पर्शी कविता....👏🏻👏🏻❤️
ReplyDeleteधन्यवाद दी
Deleteहृदयस्पर्शी कविता।हार्दिक बधाई।
ReplyDeleteधन्यवाद मैम 🙏
Deleteबहुत गहरे तक आंदोलित करती कविता, हम सबके जीवन के बहुत निकट की कविता है ये..इस सशक्त अभिव्यक्ति हेतु डॉ. पूनम जी को हार्दिक बधाई
ReplyDeleteशुक्रिया सर 🙏🙏🙏
ReplyDeleteपूनम जी बहुत परिपक्व अभिव्यक्ति आपकी इस कविता के रूप में मिली। हार्दिक बधाई।
ReplyDeleteदिल को भीतर तक छू गई आपकी कविता। बहुत सुंदर अभिव्यक्ति। बेहतरीन कविता के हार्दिक बधाई पूनम जी।सुदर्शन रत्नाकर
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