पथ के साथी

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Thursday, February 19, 2026

1494

 

झुग्गी – झोंपड़ी/  शिवानी रावत

 


             मैंने देखा उस रोज

     बेला की आँखों में महलों का सपना

      हकीकत में नन्ही- सी झोंपड़ी को 

            वो कहती घर अपना 

नन्हे- से दीये की लौ और वो चूल्हे की आग 

      उसकी झोंपड़ी का अँधियारा 

 कुछ हद तक ही कम कर पा रही थी 

इधर माँ शाम के भोजन को लेकर व्यस्त 

        उधर बेला की आँखें 

बापू के आने की राह तकती जा रही थी

 वो बाबू जो अपने बच्चों के सपनों की खातिर

   हर रोज एक नई जंग लड़ता है 

   शायद इस आ में कि 

इक दिन व इस गरीबी को पराजित कर देगा 

   और उसके आँगन में भी 

  सुख- समृद्धि के पुष्प खिलेंगे

 वह टपकती छत , वह प्लास्टिक के तिरपाल

 मेरे मन के गलियारे में मचा रहे थे भूचाल 

मेरे मन की करुणा, मेरी नाकामी पर 

    उठा रही थी सवाल 

कि काश कुछ ऐसा कर पाती 

खुद को काबिल बनाकर

 समाज की सहायक बन जाती 

वे कागज की तरह पतली दीवारें 

वह ठंड में बेला का ठिठुरना 

वह बापू की चुप्पी 

वह माँ जो धैर्य रखकर रोटियाँ सेंकती

वे गरीब जरूर है पर हारे नहीं 

व्यवस्था की बेरुखी में बेचारे हैं;

पर बेसहारे नहीं

 मैंने उस रोज उनका मन

इंसानियत से भरा देखा 

धन नहीं था उनके पास;

 पर उनका दिल बड़ा देखा

 जो मुझे महलों और ऊँची हवेलियों में 

      कभी नजर नहीं आया।