जन्मों का गठबंधन / अनिता ललित
बोली मुस्कान, आँसू से,
एक दिन आकर -
क्यों आते हो तुम -अँखियों में भर-भर?
होकर के मजबूर, मैं जाती हूँ बिखर!
बोला आँसू -
तुम आओ जो खिल-खिल कर,
मैं भी तो हो जाऊँ बेघर!
दया तुम्हें न आए मुझपर?
दुख की गगरी संग मेरे -जब नैनों में भर-भर आती,
मेरे घर भी, उस पल हर सू -बहारें ही बहारें छातीं!
लेकिन जैसे ही चौखट पर, दबे पाँव से तुम आतीं -
देख के तुमको झूम ही जाती! दुनिया मुझको भूल ही जाती!
दुनिया में सबको -तुम प्यारी! अदा तुम्हारी सबसे न्यारी,
ओढ़ा तुम्हारी चादर मुझको -ज़ालिम! साँसें रोके मेरी!
उलझे दोनों आपस में -हुई खट्टी-मीठी तक़रार!
फिर मिल बैठे, लगे सोचने -होता ऐसा आख़िर क्योंकर?
दोनों जब जज़्बात के बस में –
फिर दुश्मनी क्यों, है आपस में?
देख नम मुस्कान की आँखें, आँसू हौले से मुस्काया,
दोनों के शिक़वों का उसको, राज़ समझ में अब आया!
थाम हाथ मुस्कान का, आँसू फिर उस से बोला -
अँखियों में, जब मैं भर आता -मुझमें वजूद तेरा मुस्काता!
जब भी तुम, लब पर लहराती -अँखियों से मैं बह-बह जाता!
तुम मेरी! मैं तेरा! दोनों हम -
एक-दूजे के पूरक हैं हम!
ग़र तुम न हो -क्या हस्ती मेरी?
जो मैं नहीं -क्या क़दर तुम्हारी?
दुनिया क्या जाने साथ निभाना, ये ठहरी बेईमान!
ग़रज़-परस्त, मतलबी, यहाँ के - हैं सारे इंसान!
अपने झूठे सुख-दुःख में ये -हमको लाठ बनाए है!
कभी सजाए, कभी बहाए, जी भर हमें नचाए है !
ग़ुलाम सही हालात के हैं हम -मगर अधूरे अलग-अलग हम!
अपना तो, अनूठा बंधन -
ये है -जन्मों का गठबंधन!
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