पथ के साथी

Sunday, June 26, 2022

1220

 1-कुण्डलिया

डॉ. उपमा शर्मा

1


तुमसे ही ये मन जुड़ा
, दूर रहो या पास।

सुधियाँ देती हैं मुझे ,मोहक मधुर सुहास।

मोहक मधुर सुहास, साथ एक पल न छूटे

रब से ये अरदास,न बंधन अपना टूटे

मैं राधा तुम श्याम,कि मितवा, सात जनम से।

बने तुम मनमीत, दिलों के बंधन तुमसे

2

तरु जब काटे थे नहीं, ताल-कूप  अंबार।

नीर कहाँ से अब मिले, कर लो सोच-विचार।

कर लो सोच विचार, सूखती ताल-तलैया।

पर्वत बने मैदान, न लें फिर मेघ बलैया।

धरती होती क्लांत, न बरसेगा बादल तब।

सूखे चारों मास, काटते तुम ये तरु जब।

-0-

 

2-सपने-2

 

भीकम सिंह 

 


बीते दिनों की
 

यादों के 

कई सपने 

मेरी आँखों में 

छुपकर 

बड़े हुए हैं   

 

धड़कनों पे

मँड़राते रहे 

आषाढ़ से आषाढ़ 

सावन के 

बीचो-बीच 

खड़े हुए हैं 

 

जुगनू भर गए 

अबके अनाप- शनाप 

इसलिए 

फागुन में 

मिलने की जिद पे

अड़े हुए हैं   

 

बीते दिनों की 

यादों के 

कई सपने।

-0-

5 comments:

  1. मनभावन कुंडलियाँ और 'आँखों मे छुपकर बड़े हुए' अति सुंदर सपने!
    उपमा जी और भीकम सिंह जी को हार्दिक बधाई!

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  2. अत्यंत सुंदर..सृजन ... 👌👌🌹🙏आप दोनों को हार्दिक बधाई 🌹🌹🌹🌹💐💐💐💐

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  3. अति सुंदर...उपमा जी और भीकम सिंह जी को हार्दिक बधाई ।

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  4. सुन्दर सर्जन के लिए उपमा जी और भीकम सिंह जी को बहुत बधाई.

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  5. बहुत उम्दा, दोनों ही रचना बहुत सुंदर । हार्दिक शुभकामनाएँ।

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