पथ के साथी

Saturday, April 3, 2021

1067-चंचला

 1-शशि पाधा


हवा कुछ चंचला- सी है

न जाने कौन आया है

लहरती कुंतला- सी है

इसे किसने लुभाया है ?

 

अभी तो गुनगुनी- सी थी

ज़रा फिर शीत हो गई

नहाई धूप में जीभर  

वासन्ती  पीत हो गई

सलोनी श्यामला -सी है

रुपहला रूप पाया है ।

 

तरु शिखरों पे जा बैठी

उतर फिर डाल पर झूली

अल्हड यौवना कैसी  

अँगना द्वार ही भूली  

उलझी मेखला- सी है

किसी योगी की माया है 

 

उड़ाती खुशबूएँ इत–उत

बनी है इत्र की दूती

कभी बगिया में इतराए  

कभी जा आसमाँ छूती

सुरीली कोकिला सी है

कहीं मधुमास आया है 

 

रंगाई लहरिया चुनरी   

 पहने सातरंग चोली     

 छेड़े फाग होरी धुन

 खेले फागुनी होली

रंगोली मंगला-सी है

इसे किसने सजाया है ।

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12 comments:

  1. बहुत मनभावन कविता है शशि जी हार्दिक बधाई ।

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  2. बहुत अच्छी रचना। हार्दिक बधाई।

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  3. अति सुंदर, शशि जी।

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  4. वाह ! क्या कहने, बहुत ही सुंदर! धन्यवाद शशीजी!💐

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  5. अति सुन्दर

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  6. वाह! बहुत ही खूबसूरत कविता।
    हार्दिक बधाई आदरणीया।

    सादर-
    रश्मि विभा त्रिपाठी 'रिशू'

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  7. बहुत सुंदर रचना...हार्दिक बधाई शशि जी

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  8. शशि जी आपने वसंत के स्वागत में साहित्य की सारी उपमाओं से एक नव वधू की तरह सजा दिया | अति रोचक और पठनीय रचना के लिए हार्दिक बधाई !- श्याम हिन्दी चेतना

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  9. वाह,बहुत मधुर,मनभावन कविता।शशि पाधा जी कोबहुत बहुत बधाई।

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  10. बहुत प्यारी कविता है. शशि पाधा जी को बधाई.

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  11. बहुत खूबसूरत रचना, हार्दिक बधाई।
    -परमजीत कौर'रीत'

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  12. इस प्यारी सी कविता के लिए बहुत बधाई शशि जी

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