पथ के साथी

Saturday, March 13, 2021

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 1-फागुन, यूँ ही ना गुर जाना

              डॉ.महिमा श्रीवास्तव

  सावन आया, पर प्यासा मन रह गया

 


जाड़े आ मन तपता रहा फिर भी।

बसंत भी फूल ना खिला पाया दिल के

फागुन ,बेरंग ना छोड़ जाना इस बार।

लाख निराशाओं के घेरे रहे चारों ओर

मैंने तो आशा को गाना ही तो सीखा है।

रूखे लोगों की भीड़ में सरस सरल रहूँ

ओ फागुन तू पलाश मन वन उगा जाना।

मेरे गीत मौसम की मारों से भ्रमित हों ना

मन में फाग की  गूँज बनी रहे आजीवन,

जो बिसराएँ उनको भी नेह का गुलाल भेजूँ

मैं क्यों अपने को फागुन में उदास करूँ ?

-0-

2-क्षणिकाएँ

प्रीति अग्रवाल 'अनुजा'
1.
 परवाने
तू ने यूँ ही,
शम्मा को बदनाम किया...
वो तेरी ज़िद थीजिसने
तुझे तमाम किया...!
2.

दिन हैं सर्दी के,
बस उन्हीं का
ज़िक्र होता है...
सर्द आहों से सर्द
कुछ भी,
कहाँ होता है!
3.

चाँद तारों को लाने की
ज़हमत  कर....
तेरा होना बहुत है,
मेरे हमसफ़र....!
4.

खुली किताब हूँ मैं,
मुझे पढ़ तो सही....
तुझेतेरी कहानी
के किस्से मिलेंगे...
5.

रुलाने में तुमने
कसर तो  की थी....
 रोने की मैंने,
कसम पर है खाई....!
6.

पाबन्दी,
मुस्कुराने पे,
लगाते हैं वो.....
उनसे पूछो,
इजाज़त,
क्या रोने की है....?
7.

खिलते हैं फूल अब भी,
महकतेपर नहीं....
जाने से तेरेजाने क्यूँ,
वो बात अब नहीं....
8.

सुनती हूँ अब भी मैं ही,
औरकहते हो तुम्हीं....
झनझनाते मगर दिल के,
वो तार अब नहीं.....
9.

चाशनी में अब भी डूबी,
है ज़बांजहान की....
जाने क्यों लुत्फ उनमें,
मिठासअब नहीं....
10.

यूँ तो सब वही है,
बदला तो कुछ नहीं....
हर शय में क्यों कमी है,
क्या मैं हीबदल गई?


-0-

 

24 comments:

  1. महिमा जी सकारात्मक भाव की कविता सुंदर।

    पाबन्दी,
    मुस्कुराने पे,
    लगाते हैं वो.....
    उनसे पूछो,
    इजाज़त,
    क्या रोने की है....?
    क्षणिकाएँ मन भाई प्रीति जी।
    बधाई दोनों को।

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    1. बेहद खुशी हुई कि आपको पसंद आई, धन्यवाद अनिता जी!

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  2. डॉ महिमा जी व प्रीति जी को सुन्दर सृजन हेतु हार्दिक बधाई।

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  3. पहली क्षणिका को छोड़ सभी क्षणिकाएँ कुछ औऱ श्रम चाहती हैं ....

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    1. आपका सुझाव सिर माथे हरकीरत जी, बहुत बहुत धन्यवाद!

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  4. बहुत सुंदर क्षणिकाएं..👌👌प्रीति जी
    सुंदर कविता महिमा जी💐👌👌💐💐 बहुत बधाई आप दोनों को

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    1. प्रोत्साहन के लिए आभार गुंजन जी!

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  5. सुंदर सृजन, बधाई।

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  6. महिमा जी की सुंदर भाव की कविता।प्रीति जी की क्षणिकाएँ बहुत खूब।

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    1. मनोबल बढ़ाने के लिए धन्यवाद सुरँगमा जी!!

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  7. बेकल मन का सुंदर निश्चय, 'मैं क्यों फागुन में अपने को उदास करुँ, सूंदर रचना के लिए बधाई महिमा जी!
    मेरी आवाज़ आप सब मित्रों तक पहुंचाने के लिए आदरणीय काम्बोज भाई साहब का आभार!!

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  8. अच्छी रचनाएँ- बधाई। महिमा जो ने फागुन को रँगने का बीड़ा उठाया है वहीं प्रीति जी ने शब्दों को साधने की अच्छी कोशिश की है।

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  9. ऐ परवाने
    तू ने यूँ ही,
    शम्मा को बदनाम किया...
    वो तेरी ज़िद थी, जिसने
    तुझे तमाम किया.

    बहुत बढ़िया प्रीति जी। बधाई
    सकारात्मक भाव की सुंदर अभिव्यक्ति । बधाई महिमा जी।

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  10. सुंदर सृजन....आप दोनों को हार्दिक बधाई।

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  11. महिमा जी एवं सरिता जी आपकी रचनाएं पढकर मन की भावनाओं को एक आनन्द की अनुभूति हुयी | प्रकृति के सौन्दर्य में डूबी हुयी रचनाएं बहुत ही सार्थक और मनभावन लगीं | शुभकामनाओं सहित -श्याम हिन्दी चेतना

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  12. बहुत ही सुंदर सृजन....महिमा जी एवँ प्रीति जी को हार्दिक बधाई।

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  13. महिमा जी की कविता और प्रीति जी की क्षणिकाएँ बहुत सुन्दर है. बहुत बधाई आप दोनों को.

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  14. अदरणीय रमेश सोनी जी, सुदर्शन दी, कृष्णा जी, श्याम भाई साहब, ज्योस्तना जी और जेन्नी जी, आप सब का हार्दिक आभार!

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  15. महिमा जी और प्रीति जी आप दोनो को सुन्दर रचनाओं के लिए बधाई। क्षणिकाओं में विभिन्न भाव,बहुत गहराई दोनों ही रचनाओं में।बधाई।💐

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  16. महिमा जी और प्रीति को सुंदर सृजन के लिए हार्दिक बधाई।

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