पथ के साथी

Saturday, April 13, 2019

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फिर से राम चले वन पथ पर
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'


अंधकार ये कैसा छाया
सूरज भी रह गया सहमकर
सिंहासन पर रावण बैठा
फिर से राम चले वन पथ पर ।

लोग कपट के महलों में रह,
सारी उमर बिता देते हैं
शिकन नहीं आती माथे पर
छाती और फुला लेते हैं
कौर लूटते हैं भूखों का
फिर भी चलते हैं इतराकर।

दरबारों में हाजि़र होकर,
गीत नहीं हम गाने वाले
चरण चूमना नहीं है आदत
ना हम शीश झुकाने वाले
मेहनत की सूखी रोटी भी
हमने खाई थी गा ­गाकर

दया नहीं है जिनके मन में
उनसे अपना जुड़े न नाता
चाहे सेठ मुनि ­ज्ञानी हो
फूटी आँख न हमें सुहाता
ठोकर खाकर गिरते पड़ते
पथ पर बढ़ते रहे सँभलकर
-0-  सितम्बर 2008

10 comments:

  1. बहुत स्वभिमान से ओतप्रोत कविता है कटाक्ष भी है काम्बोज जी हार्दिक बधाई |

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  2. मानव जिसमें स्वभिमान नहीं, वह पशु समान,
    कविता के हर शब्द में भरा हुआ है आत्म सम्मान | इस प्रकार की रचनाएं अब कौन लिख पाता है | काम्बोज जी इस पुआर्नी रचना के लिए ढेर सारी बधाई | कविता कभी पुरानी नहीं होती है यदि उसमें सच्चाई हो | तुलसी की रामचरित इतने वर्षों के बाद भी आज भी उसे पढकर कुछ न कुछ नया मिल ही जाया है | श्याम हिन्दी चेतना

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  3. आज के सन्दर्भ में भी सार्थक | सुरेन्द्र वर्मा |

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  4. सुन्दर प्रासंगिक रचना।

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  5. वाह----
    'दरबारों में हाजि़र होकर,
    गीत नहीं हम गाने वाले
    चरण चूमना नहीं है आदत
    ना हम शीश झुकाने वाले
    मेहनत की सूखी रोटी भी
    हमने खाई थी गा ­गाकर
    ....सच्चे कवि धर्म की सुंदर व्याख्या,सशक्त कविता,श्रेष्ठ कविताएँ कभी पुरानी नही होती,आपकी यह कविता भी सदा नवीन रहेगी

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  6. सुन्दर भाव लिए एक सशक्त कविता .... बहुत -बहुत बधाई आपको आदरणीय !!

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  7. सुन्दर भाव लिए एक सशक्त कविता .... बहुत -बहुत बधाई आपको आदरणीय !!

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  8. सुन्दर तथा सशक्त रचना....बहुत बधाई आपको आदरणीय !!

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  9. बहुत सुन्दर सृजन....हार्दिक बधाई भैया जी!!

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