पथ के साथी

Tuesday, October 16, 2018

853-एक दीपक तुम जलाना


रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

काल की गहरी निशा है
दर्द भीगी हर दिशा है।
साथ तुम मेरा निभाना
नहीं पथ में छोड़ जाना।
छोड़ दे जब साथ दुनिया
कंठ  से मुझको लगाना
एक दीपक तुम जलाना।।

गहन है मन का अँधेरा
दूर मीलों है सवेरा।
कारवाँ  लूटा किसी ने
नफ़रतों ने प्यार घेरा ।
यहाँ अंधों के  नगर  में   
क्या इन्हें दर्पण दिखाना।
एक दीपक तुम जलाना।।

एक अकेली स्फुलिंग थी
दावानल बन वह फैली।
थी ऋचा -सी पूत धारा
ईर्ष्या-तपी,  हुई मैली।
कालरात्रि का  है पहरा
ज्योति बनकर पथ दिखाना।
एक दीपक तुम जलाना।।  
-०-

14 comments:

  1. अनुपम, हार्दिक बधाई।

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  2. भावपूर्ण सुन्दर रचना... हार्दिक अभिनंदन

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (17-10-2018) को "विद्वानों के वाक्य" (चर्चा अंक-3127) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. भावपूर्ण उत्म सृजन।

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  5. बहुत ही गहन भावपूर्ण रचना भैया जी।
    हार्दिक बधाई

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  6. अत्युत्तम , भावपूर्ण रचना।

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  7. उम्दा भावपूर्ण रचना...हार्दिक बधाई।

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  8. ज्योत से ज्योत जलाना / एक दीपक तुम जलाना | सुंदर और कोमल भाव | बधाई भैया |

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  9. आप सबकी उत्साहवर्धक टिप्पणियों के लिए ह्रदय से आभारी हूँ .

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  10. Ek deepak tum jalana bahut bhavuk kar dene vali marmsparshi rachna kamboj ji aapko hardik badhai..

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  11. अतिसुन्दर !इतनी प्यारी तथा भावपूर्ण रचना के लिए आपको हृदय -तल से बधाई भैया जी !!

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  12. आप दोनों का बहुत आभार

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  13. बहुत सुन्दर रचना है भाई कम्बोज जी अनेक बधाई स्वीकारें |

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  14. बहुत सुंदर गीत आदरणीय रामेश्वर सर

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