पथ के साथी

Thursday, January 22, 2026

सरस्वती -वन्दना

  डॉ.सुरंगमा यादव

 


द्मासना वीणापाणि, ज्ञान गरिमादायिनी

श्वेतवसना, शुभ्रवर्णा, हस्त पुस्तकधारिणी

है प्रणत मन तव चरण में ,तुम कृपा साकार हो
प्रज्ञा की प्रखरता तुम्हीं, सृजन का आधार हो
शीश पर माँ हाथ धर दो, प्रार्थना स्वीकार हो।।

सप्त स्वर,नवरस स्वरूपा, तुम कला का मान हो
चेतना का जागरण हो, लक्ष्य का संधान हो
सोए संवेदन जगा दो, प्रेम का उपधान दो ।।

तृषित जग चातक विकल माँ, वासना के ताप से
ज्ञान स्वाति बिंदु माँगे, याचना में आपसे
मानवोचित भाव चिंतन, आचरण निष्पाप दो।।

 

 

 

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