डॉ.सुरंगमा यादव
पद्मासना वीणापाणि, ज्ञान गरिमादायिनी
श्वेतवसना, शुभ्रवर्णा, हस्त पुस्तकधारिणी
है प्रणत मन तव चरण में ,तुम कृपा साकार हो
प्रज्ञा की प्रखरता तुम्हीं, सृजन का आधार हो
शीश पर माँ हाथ धर दो, प्रार्थना स्वीकार हो।।
सप्त स्वर,नवरस स्वरूपा, तुम कला का मान हो
चेतना का जागरण हो, लक्ष्य का संधान हो
सोए संवेदन जगा दो, प्रेम का उपधान दो ।।
तृषित जग चातक विकल माँ, वासना के ताप से
ज्ञान स्वाति बिंदु माँगे, याचना में आपसे
मानवोचित भाव चिंतन, आचरण निष्पाप दो।।

माँ सरस्वती जी की वंदना पर कोई टिप्पणी लिख सकूँ इतनी क्षमता ही नहीं है मुझमें बस इतना ही कह पाऊँगी कि सरस्वती जी को समर्पित इस वंदन गीत में जिन शब्दों को पिरोया गया है वो बहुत ही उत्कृष्ट हैं और शैली भी अद्भुत और वंदनीय है...🙏🏻👏🏻👏🏻
ReplyDeleteबहुत सुंदर, सादर वंदन
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर, हार्दिक शुभकामनाएँ।
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर आपको हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।
ReplyDeleteसुरभि डागर
बहुत सुन्दर भावपूर्ण वंदना। हार्दिक बधाई
ReplyDeleteबहुत सुन्दर भावपूर्ण वंदना...हार्दिक शुभकामनाएँ।
ReplyDeleteभावपूर्ण वंदना🙏🙏
ReplyDeleteउत्कृष्ट, भावपूर्ण सरस्वती-वंदना।सुदर्शन रत्नाकर
ReplyDeleteबहुत सुंदर वंदना सुरंगमा जी!
ReplyDeleteअत्यंत सुन्दर भावपूर्ण शब्दों से सजी सरस्वती वंदना की बहुत -बहुत बधाई
ReplyDeleteशीला मिश्रा