पथ के साथी

Thursday, August 31, 2017

758

1-हादसे ही हादसे
डॉ.शिवजी श्रीवास्तव

हर दिशा में हादसे ही हादसे हैं,
या खुदा हम किस शहर में आ बसे हैं।
राजपथ पर ही सुरंगें फट रही हैं,
और सिंहासन खड़े चुपचाप से हैं।
कौन अब किससे कहे अपनी व्यथाएँ,
हर किसी की पीठ में खंजर धँसे हैं।
सिरफिरा उनको सियासत कह रही है
जो कि आँखें खोलकर मुट्ठी कसे हैं।
-0-
2-रेगिस्तान
- मंजूषा मन

लहलहाते प्रेम- वृक्ष
काट लिये गए,
घने -घने जंगल उजाड़ डाले गए
बंजर कर दी गई
मन की ज़मीन।

नहीं पाई नेह को नमी
न हुई अपनेपन की बारिश
न मिल पाए 
प्रेम के उपयुक्त बीज ही,
बेहिसाब बरसे नमकीन आँसुओं ने
और भी किया बंजर।

धीरे धीरे,
पत्थर होती गई मन की मीन
खोती गई 
अपने भावों की उर्वरता
जो बनाए रखती थी
जीवन मे हरियाली।

पत्थर और कठोर हुए
टूटे
टूट कर बिखरे
नष्ट करते रहे स्वयं को
और बदल गए
रेगिस्तान में।

मन की धरती
सदा नहीं थी रेगिस्तान...

प्रेम बन बरसो तो,
सदा नहीं रहेगी रेगिस्तान।

-0-

11 comments:

  1. दो अलग-अलग विषयों पर अलग-अलग मानसिक व्यथा को बयान करती इन सुन्दर रचनाओं के लिए हार्दिक बधाई शिव जी और मंजूषा जी...|

    ReplyDelete
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (01-09-2017) को "सन्तों के भेष में छिपे, हैवान आज तो" (चर्चा अंक 2714) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  3. बहुत बढ़िया दोनों रचनाएँ...शिव जी, मंजूषा जी हार्दिक बधाई।

    ReplyDelete
  4. Bahut bhavpurn lekhan,badi gahan abhivyakti hai, rachnakaron ko meri bahut su badhai.

    ReplyDelete
  5. डॉ शिवजी सर की रचना बहुत सुंदर है तो मंजूषा जी की रचना भी प्यारी सी है । अच्छा लगा कुछ अच्छा पढ़कर । शिवाजी सर मेरे गुरु है उनका शिष्य होने पर मैं अपने को धनवान समझता हू । कंबोज सर अच्छी रचनाओ को देने के लिए आपका आभार ।

    ReplyDelete
  6. डॉ. शिव जी बहुत मतला और दोनों शेर बहुत खूबसूरत ... हार्दिक बधाई

    ReplyDelete
  7. मन की धरती सदा नहीं रहती रेगिस्तान

    ह्रदयस्पर्शी सृजन मंजूषा जी आत्मिक बधाई।

    ReplyDelete
  8. हादसे...बेहतरीन सृजन डॉ.शिव जी

    ReplyDelete
  9. मन को उद्वेलित करती बहुत सुन्दर रचनाएँ !
    दोनों रचनाकारों को हार्दिक बधाई !!

    ReplyDelete
  10. दोनों रचनाएँ बहुत बढ़िया!!!
    डॉ. शिव जी और मंजूषा जी ,बढ़िया रचनाओं के लिए हार्दिक बधाई!!

    ReplyDelete
  11. हादसे ही हादसे रचना बहुत सुन्दर लगी और रेगिस्तान भाव पूर्ण आशावादी रचना है मन की धरती जो रेगिस्तान में बदल चुकी है प्रेम रस के सींचन से पुन: हरिभरी हो जायेगी । यह आस बाकी है ।दोनों रचना कारों को बधाई ।

    ReplyDelete