पथ के साथी

Tuesday, February 4, 2025

1447

 

एडजस्टमेंट

लिली मित्रा

 


नीले सलवार-कमीज़ पर हरी बिंदी!!

कोई तुक बनता है क्या?

सूरज की रोशनी में घुटन

और

धुंध में जीवन का उजास

अटपटी सी सोच लगती है... ना?

एक पिंजरे में कैद पंछी आसमान को देख

जब पंख फड़कता होगा तो

ऐसा ही कुछ मन में कल्पना करता होगा…

उस पंछी के लिए 'एडजस्टमेंट' बस इतना

सा आशय रखता हो...शायद।

पर हर औरत ये कहती सुनाई देती है-

थोड़ा सा एडजस्ट करो...हो जाएगा।

एडजस्टमेंट औरत के शब्दकोश का एक जरूरी शब्द क्यों है?

और यही एक आवश्यक शब्द जब विद्रोह का बिगुल बजाता है

तो उसकी ध्वनि में अट्टहास का सुर नहीं

किसी जलतरंग की तरंग का लहरिया सुर होता है

जो पहले उसकी रगों में

फिर उसके परिवेश, तदनंतर संपूर्ण ब्रह्मांड

में फैल जाता है।

वह जुट जाती है इस शब्द के कई पर्याय बनाने में,

इस शब्द की नई व्याकरण गढ़ने में।

पर्याय का हर शब्द नए सन्दर्भानुकूल अर्थ-परिधान में

उपस्थित होता है

वो इस 'एडजस्टमेंट' का पिंजरा तोड़ता नहीं है-

पिंजरे की फांक से पूरा असमान खुद में

घसीट लेता है...

-0- फरीदाबाद, हरियाणा।

(मृदुला गर्ग जी की कहानी 'हरी बिंदी'  पढ़ने के बाद उपजी कविता)

-0-

Monday, February 3, 2025

1446

 

वासन्ती  पाहुन

शशि पाधा


वासन्ती  पाहुन लौट के  आया
डार देह की भरी-भरी
मंद-मंद पुरवा के झूले
नेह की गगरी झरी-झरी

 
उड़-उड़ जाए हरित ओढ़नी
जाने कितने पंख  लगे
रुनझुन गाए गीत पैंजनी
कंगना मन की बात कहे

 
ओझल हो न पल भर साजन
 
मुखड़ा देखूँ घड़ी-घड़ी।

कभी निहारूँ रूप आरसी
कभी मैं सूनी माँग भरूँ
चन्दन कोमल अंग  सँवारे
बिछुआ सोहे पाँव धरूँ

 
जूही- चम्पा वेणी बाँधूं
 
मोती माणक जड़ी-जड़ी

 
रुत  वासन्ती सज धज आई
देहरी आँगन धूप धुले
आम्र तरू पे गाये कोयल
सौरभ के नव द्वार खुले

     
ओस कणों में हँसती किरणें
     
हीरक कणियाँ लड़ी-लड़ी

महुआ टेसू गँध बिखेरें
आँख मूँद पहचान करूँ
कलश प्रीत का छल- छल छलके
अँजुरी भर रसपान करूँ

   
मौसम ने सतरंग बिखराये 
   
धरा वासंती लाल-हरी

-0-

Monday, January 13, 2025

1445

 

लौट आओ 

    - सुशीला शील स्वयंसिद्धा

 

 

 त्योहारों की रौनको 

 लौट आओ !

 कितनी सूनी है मन की गलियाँ 

 बरसों से नहीं चखी 

लोकगीतों की मिठास 

सूनी सी आँखें 

पलक -पावड़े बिछाए हैं 

कभी तो दिखेंगी

हँसती-गाती-नाचती-हुलसती 

हुड़दंग करती बच्चों की टोलियाँ 

 

 यादों में तैर-तैर जाते हैं दूल्हा- भट्टी 

 जीभ पर अनायास 

 आ विराजती है गुड़ की पट्टी 

 संग चली आती हैं गज्जक-रेवड़ियाँ 

 टप्पे-बोलियाँ 

 सुंदर मुंदरिये संग 

 झूमते टीके-बालियाँ 

 थिरकती पायल 

 खनकती चूड़ियाँ 

 मचलते परांदे 

हँसती फुलकारियाँ 

चहक उठती हैं 

नचदी कुड़ियाँ -

सानू दे दे लोहड़ी 

तेरी जीवै जोड़ी 

 

 

 लोहड़ी की आग और रेवड़ियों से 

 बिछड़ गए हैं उपले 

 चली आई हैं थोक में लकड़ियाँ 

 कहाँ दे पाती हैं उपले जैसी 

 धीमी आँच और तपन 

 जिनको थापते-सुखाते 

 होते थे स्नेहिल जतन 

 

 

महीनों के त्योहार

सिमट गए हैं चंद घंटों में 

खो गए हैं चूल्हे-भट्टी  

कड़ाहियों में पकती गजक-पट्टी 

माँ के हाथों की मिठास 

दुकानों के सौदों में खो गई है 

तरक़्क़ी करते-करते 

जिंदगी कितनी फ़ीकी हो गई है

 

 

 त्योहारों की रौनको 

ओ ढोल ओ ताशो !

ओ उत्साह ओ उल्लास 

ओ तन मन का हुलास 

लौट आओ !

लौट आओ ! !

-0-

Saturday, January 11, 2025

1444-मैं चला जाऊँगा

  रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

 

मैं चला जाऊँगा

बहुत दूर

चाँद और सूरज से परे

अब लौट न पाऊँगा।

फिर भी

कभी हवा बनके

कुछ खुशबू ,

तुम्हारे आँगन में

बिखरा जाऊँगा।

 

ताप जब तुम्हें सताए

मैं बनके बदरा

बरस जाऊँगा,

पर मैं लौट न पाऊँगा।

 

शर्तों में नहीं जिया;

इसलिए

केवल विष ही पिया

सुकर्म भूल गए सब

दूसरों के पापों का बोझ

मैंने अपने ऊपर लिया

जी-जीके मरा

मर-मरके जिया।

 

ऐसा भी होता है

जीवन कि

मरुभूमि में चलते रहो

निन्दा की धूल के

थपेड़े खाकर

जलते रहो ।

जिनसे मिली छाँव

वे गाछ ही  छाँट दिए

जिन हाथों ने दिया सहारा

वे काट दिए

ऐसे में मैं कैसे आऊँगा ?

कण्ठ है अवरुद्ध                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             

गीत कैसे गाऊँगा ?

मैंने  किया भी क्या ?

जो दुःखी थे

उनको और दुःख दिया

मेरे कारण औरों ने भी

ज़हर ही पिया

सबका शुक्रिया!

Wednesday, January 1, 2025

1443

1-करो स्वागत

सुदर्शन रत्नाकर

 


बीत रहा है धीरे-धीरे

अस्तित्वहीन होता वर्ष

उखडी-उखड़ी -सी साँसें हैं

उदासी है छाई,

कहीं नहीं है हर्ष।

मौसम में नमी है

धूप भी अलसाई है

थके- थके दिन हैं,

रातों में ठंडाई है।

जीवन में उत्साह नहीं

बिछुड़ने की परवाह नहीं।

जा रहा है, तो जाने दो

जाने दो साथ में

सालभर की नकारात्मक

 सोच को

पाँवों में चुभे शूलों को

अपनी की हुई भूलों को।

विरोधियों की आवाज़ को

सड़ी -गली मान्यताओं को

पोंछ दो दर्पण पर पड़ी धूल को

जिसमें दिखाई नहीं देता

अपना ही असली चेहरा।

 

नए वर्ष का अभिनंदन करो

पुराने को भूल जाओ

नव उमंग, नव क्रांति

मिटाकर मन की भ्रांति

करो स्वागत, उगती नव किरणों का

फैला दें जो उजास

नव आशाओं का।

-0-


2-पाहुन/-शशि पाधा

 

द्वारे इक पाहुन है आया

सुख सपनों की डलिया लाया 

 

आशाओं की हीरक मणियाँ 

विश्वासों की झिलमिल लड़ियाँ 

प्रेम-प्यार के बन्दनवार

सजी-सजी हर मन की गलियाँ 

 

मंगल दीप जलें देहरी पर

किरणों ने नवरंग बिखराया

 दूर दिशा से पाहुन  आया 


नया सवेरा, नई ऊषा में

जीवन की उमंग नई

समय की धारा के संग बहती

जीवन की तरंग नई


राग रंग से रंगी दिशाएँ

इन्द्र धनु से थाल सजाया

  नव वर्ष द्वारे है आया 

          

धरती ,सागर, नदिया पर्वत

स्वागत’ ’स्वागत’ बोल रहे

आगत के कानों में पंछी

नव कलरव रस घोल रहे

  रोम-रोम बगिया का पुलकित

   सृष्टि ने नवगीत है गाया

  नव पाहुन द्वारे पर आया।

-0-

3-नववर्ष!

डॉ.सुरंगमा यादव

इक्कीसवीं सदी अबचौबीस बरस की हो ली

पच्चीसवें    वसंतीसपनों ने   आँखें खोलीं

खोने की है कसक  तोपाने का सुकूँ भी है

छूने को आसमाँ हैमन में  जुनून भी है

नववर्ष तू  दिलों मेंसंकल्प ऐसा भरना

मुट्ठी में कर लें सागर,मन में गुमान हो ना।

 

 


Wednesday, December 11, 2024

1442-अनुभूतियाँ

  रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1


1

कोई मिलता भी कैसे, चाहा नहीं किसी को।

सिर्फ चाहा जब तुम्हें ही, समय पाखी बन उड़ा..।

2

जाऊँगा कहाँ मैं तुम्हारे बिना

रही तुम्हीं मंजिल, रास्ता तुम्हीं हो!

3

भीड़ और कोलहल, फिर भी अकेला मन

कोई ना आया, याद तेरी आ गई!

4

कैसे मैं तेरा दुःख बाँटूँ

कैसे पाश दुःखों के काटूँ

निशदिन सोचूँ राह ना पाऊँ

पता नहीं किस द्वारे जाऊँ

5

जिस पल सोचा ढंग से जी लें,

तभी किसी ने पत्थर मारा।

कौन पाप मैंने कर डाला

सोच रहा है मन बेचारा।

6

महलों की रौशनी भटकाती हैं उम्रभर!

रह -रहकर हमें टपकता छप्पर याद आया।

7

हो कितना भी अँधेरा, तुम्हें कभी रुकना नहीं है।

सुख -दुःख मौसम समझ लो, बीत  जाएँगे सभी

हम तुम्हारे साथ हैं, तुम्हें पथ में रुकना नहीं है।

8


तुम समुद्र हो न
?

कहाँ से आते हो?

इतना सारा प्यार

कहाँ से लाते हो!

कुछ तो बोलो

वाणी में वही मिश्री घोलो

9

मैं तुम्हारी रूह का ही एक हिस्सा हूँ

लघुकथा में ज्यों पिरोया एक किस्सा हूँ ।

10

पता नहीं कैसे हो त्राण?

तुझमें अटके मेरे प्राण।

-0-