पथ के साथी

Wednesday, March 12, 2025

1454

 

कवित्त

1-गुंजन अग्रवाल अनहद


1

श्याम रंग चहूँ ओर, भीग गयो पोर- पोर,

अंग- अंग राधिका के, दामिनी मचल उठी।

प्रेम की पिपासा गाज भूल ग लोक-लाज

अधरों पे राधिका के रागिनी मचल उठी।

मन में मलंग उठे, हिय में तरंग उठे,

छेड़ गयो चितचोर कामिनी मचल उठी।

सारा रंग, देह सारी, मार गयो पिचकारी,

अब के फगुनवा में ग्वालिनी मचल उठी।

2

खेलनको आये होरी, करें श्याम बरजोरी

भंग की तरंग संग, करत धमाल हैं।

बलखाती चलें गोरी, हाथ लिये हैं कमोरी।

संग में किशोरी आईं, फेंकत गुलाल हैं।

मार दई पिचकारी, भीगी देह सुकुमारी,

लाज से लजाय गई , लाल हुए गाल हैं।

अंग- अंग में उमंग , मन में उठी तरंग,

श्याम रँग रंगी मन, बसे नंदलाल हैं।

3

बरसाने की मैं छोरी नाजुक कलाई मोरी

करेगो जो बरजोरी हल्ला मैं मचाय दूँ।

नैनन सों वार कर बतियाँहजार कर,

मुसकाय उकसाय झट से लजाय दूँ।

छेड़ेगो जो अब मोय, रंग में डुबोय तोय,

 साँची-साँची बोलती हूँ गोकुल पठाय दूँ।

हाथन में हाथ डार, रगड़े जो गाल लाल,

करैगो जो जोरदारी, रंग में डुबाय दूँ।

-0-

गुंजन अग्रवाल अनहद’, फरीदाबाद 

सम्पर्क. 9911770367

 -0-

आई होली वर्ष पच्चीस की

दिनेश चन्द्र पाण्डेय


1.

केसर कली की पिचकारी

पात-पात की देह सँवारी

रवि- किरणों से रंग चुराकर

प्योली ने अपनी छटा बिखेरी

होली आई अपने रंग में

फिजा में घुले नशीले गीत

समय से पहले खिले बुराँ

वादियाँ हुईं युवा व  सुरभित

गुलाल, अबीर, हरा, पीला

सब निकले बाहर बाग-वनों से

खुशरंग चुराकर फूलों से

खुद पर छिड़के इन्सानों नें

2.

जितने रंग थे दुनिया भर में

सब व्हाट्सएप पर छाए हैं.

भले ही घर में तंगहाल हो

फोन पे छटा बिखरा है.

हँसते चेहरे फेसबुक पे

फूल कली मुसका हैं

सूने पड़े गलियों के पैसेज

भटके फिरें होली के मैसेज

-0- 

Saturday, March 8, 2025

1453-महिला दिवस

मुक्तक

डॉ. सुरंगमा यादव

 


1.

मिले तूफान राहों में, हमें पर रोक ना पाए 

कभी इरादों की स्याही, समन्दर टोक ना पाए

जो जुनूँ का क दरिया हमारे दिल में बहता है

लाख सूरज तपे लेकिन, से वह सोख ना पाए॥

2.

कोई मौसम, कोई रस्ता, हमें बस चलते जाना है  

दिखाए व़क्त ग़र तेवर, नहीं इक आँसू बहाना है

पसारे भुजाएँ कब रास्ते ये हम सबको बुलाते हैं

अगर पाना है मंज़िल तो क़दम ख़ुद तुमको बढ़ाना है॥

3.

सजे दीपक के संग ज्योति त दीपक सुहाता है

हो जब अक्षत-संग रोली तभी टीका भी भाता है।

है नारी प्यार की मूरत, बिन उसके कहाँ घर है

बिन मूरत के मंदिर भी कहाँ मंदिर कहाता है॥

4.

है नारी- मन तपोवन-सा, प्रेम-करुणा लुटाता है 

जो करता मान नारी का, वही सम्मान पाता है।

बिछाकर राह में काँटे क्यों परखते बल तुम उसका -

है वही काली, वहीं लक्ष्मी, वही बुद्धि प्रदाता है॥

-0-

Thursday, March 6, 2025

1452

 डॉ. कनक लता मिश्रा

1-  सरस्वती वंदना

 


माँ सरस्वती,  माँ शारदे,  माँ शारदे, माँ सरस्वती 

तू ज्ञान का वरदान दे, माँ ज्ञानदा माँ भारती

माँ सरस्वती…

धुन तेरी वीणा की बजे, हो हृदय में तेरा ही वास,  

स्वर तेरे गूंजे मेरे स्वर, जीवन बने तुझसे उजास 

करूँ वंदना, करूँ प्रार्थना, अभ्यर्थना करूँ स्तुति 

माँ सरस्वती..

 

मिट जाय सब मन के विकार जो हो श्वास में तेरा निवास

अन्तःकरण हो दीप्तिमान कर ज्ञान ज्योति का प्रकाश 

सब कुछ मेरा तेरी सर्जना गाउ तेरी ही अनुश्रुति 

माँ सरस्वती…. 

 

हो आत्म बोध हो मन प्रबल चैतन्य मन में तेरा वास 

आनंद हो या वेदना,  अवलंब तू तेरी ही आस

दृष्टि तू मेरी दिव्य कर माँ दूर कर सब विकृति 

माँ सरस्वती…

-0-

 

2-  मन का शृंगार

 

कैसे करूँ मन का शृंगार 

क्षण क्षण देखूँ रूप निहार,  

अधीर, अधूरा, आरव है,  

पल प्रतिपल द्वंद्व है इसमें,

स्वयं से जीते,  कभी माने हार,  

कैसे करूँ मन का ..

 

कितनी इच्छाएँ,  कितनी आशाएँ  

कभी हो दृढ़, तो कभी हो विचलित,  

कभी तो लगे सब ही निराधार,  

कैसे करूँ मन का …

 

कभी हो उदास,  कभी हो निराश,  

कभी तो बहे प्रेम रसधार,  

कभी हो लोभ,  कभी हो क्षोभ,  

कभी त्याग की उठे फुहार,  

कौन रूप सजाऊँ इसका,  

हो ना जिसमें कोई विकार,  

कैसे करूँ मन का …

 

मन का अपना ही रंगमंच है,  

धारण करे रूप अपार,  

कभी हर्ष का कोलाहल है,  

कभी विषाद की निर्ममता 

भूमिकाएँ हैं अनेक

अनेक रूप में करूँ विचार,  

कैसे करूँ मन का शृंगार 

कैसे करूँ मन का…

-0-St.Joseph’s College for Women, Civil Lines, Gorakhpur

 

Friday, February 28, 2025

1451

 रुत वासन्ती आती है...

             प्रणति ठाकुर

 


आम्र मंजरी की मखमल सी राहों पर पग धर- धरकर 

शुभ्र, सुवासित अनिल श्वास में,पोर - पोर में भर -भरकर

ये अवनी सुखदा सज-धज  जब राग प्रेम के गाती है 

तब शिशिर शिविर में हलचल करती रुत वासन्ती आती है।

 

जब मदन बाण से दग्ध हृदय ले कली- कली खिल जाती है

जब पीत रंग का वसन पहन ये धरा मुदित मुस्काती है 

जब अंतर का अनुताप सहन कर कोकिल गीत सुनाती है

तब शिशिर शिविर में हलचल करती रुत वासन्ती आती है।

 


जब पथिक हृदय का प्रेम प्रगल्भित हो  पलाश का फूल बने 

जब अलि कुल का मादक गुंजन गोरी के मन का शूल बने

जब पनघट पर परछाई को लखकर मुग्धा शरमाती है

तब शिशिर शिविर में हलचल करती रुत वासन्ती आती है।

 

जब साँझ-भोर के मिलन डोर को थामे रात सुहानी- सी

जब टीस हृदय में उठती हो उस निश्छल प्रेम पुराने की 

जब चारु अलक  की मदिर याद नागन बनकर डस जाती है

तब शिशिर शिविर में हलचल करती रुत वासन्ती आती है।

 

गोरी के मन की पीड़ बढ़ाती विरह - व्यथा जब मुस्काए

निज श्वासों के ही मधुर गंध विरहन मन को जब बहलाए

अपने पायल की छुन -छुन जब पलकों की नींद उड़ाती है 

तब शिशिर शिविर में हलचल करती रुत वासन्ती आती है।

 

साँसों में मलय बयार लिए, अधरों पर मधुर पुकार लिये

अनुरक्त नयन के पुष्पों से सज्जित पावन उपहार लिये 

परदेसी की द्विविधा चलकर जब विरहन  द्वारे आती है

तब शिशिर शिविर में हलचल करती रुत वासन्ती आती है।

तब शिशिर शिविर में हलचल करती रुत वासन्ती आती है।

-0-

Saturday, February 22, 2025

1450-दो कविताएँ

 

अनुपमा त्रिपाठी 'सुकृति'

1


भोर का बस इतना

पता ठिकाना है
कि भोर होते ही
चिड़ियों को दाना चुगने
पंखों में भर आसमान
अपनी अपनी उड़ान
उड़ते जाना है...!!!
-0-

2

आकंठ आमोद संग

प्रमुदित प्रभास का

सुगन्धित स्पर्श...

मृदुमय शांत वातावरण में अमृत घोलता...

चहचहाते पक्षियों का कलरव...

स्वयं से स्वयं तक की यात्रा का

प्रथम पड़ाव...

प्रात इस तरह हो

तो जीवन की गाथा लिखना

हृदयानंदित करता है...!!!

-0-

 

Thursday, February 13, 2025

1449-तीन कविताएँ

 

1-मखमली अहसास— रश्मि विभा त्रिपाठी

तुम्हारे होंठ
गुलाब की पंखुड़ी हैं
ये पंखुड़ियाँ
हिलती हैं जब
साफगोई की हवा के तिरने से
जज़्बात की शबनम के गिरने से
तब
ख़ुशबू में लिपटे
तुम्हारे लफ़्ज़
महका देते हैं
हर बार मुझे

रेशम- सी हैं
तुम्हारी हथेलियाँ
जो सोखती हैं
मेरी आँखों की नमी
तुमने जब मेरा सर सहलाया था
तो तुम्हारी उँगलियों के
पोरों के निशान
पड़ गए
मेरे भीतर
उनसे मुझे पता चला
कि दुनिया की सबसे कोमल शय
तुम्हारी रूह है

तुम्हारे सीने से लगके
मुझे महसूस हुआ
कि तुमने रख दिए
मेरे गालों पे नर्म फाहे
आज जी चाहे
बता दूँ तुम्हें
मैंने तभी जाना—
कपास
प्रेमी के हृदय में सबसे पहले उगा होगा
इसलिए तो तुम्हारी तरह दिव्य है,
पवित्र है,
निष्कलंक है
और रूह को सुकून देने वाला है
तभी तो ईश्वर ने भी उसे ढाला है
मंदिर की जोत में,
तुम‐ सा वह
फरिश्ता है
हर घाव जो रिसता है
उसपे मरहम मले
दे दर्द से मुक्ति
बिछ जाता है
थकान के तले
जब तुमने बाहें फैलाई थीं
मेरे लिए
और मैं आकर
तुमसे लिपटी थी
तो लगा था
तुमने बिछा दिया है
मेरे लिए
एक घास का गलीचा हरा
मैं हिरनी- सी कुलाचें मारने लगी थी

दुनिया ने छील दिया है मुझे
मेरी खुरदरी ज़िन्दगी
इस हाल में
चाहती है पनाह
तुम्हारी बाहों के बुग्याल में
ताकि उतर आए मुझमें
तुम्हारा मखमली अहसास
जो हर टीस भुला दे
चैन की नींद सुला दे,
वक्त के बिस्तर पर
मैं जब लेटूँ
अतीत की चादर ओढ़कर।
—0— 



2-गौर से देखा होता कभी— रश्मि विभा त्रिपाठी

 

गौर से देखा होता कभी 

मेरी आँखें— 

सर्द स्याह रात के बाद 

निकली

भोर की पहली किरण 

पलकें उठतीं 

तो मिलती गुनगुनी- सी धूप 

ठिठुरता तन गरमाता

 

आँखों में सपनों के बादल

घुमड़ते

अवसाद का ताप 

मिट्टी में समाता

 

आँखों में 

नेह का सावन 

बरसता तेरी हथेली पर

हरियाली की 

फसल उगाता

 

तेरे होठों पर भी था 

पतझड़ के बाद का

बसंत 

मदमाता

लफ़्ज़ों के खिलते फूल 

तो रिश्ते का ठूँठ 

लहलहाता

 

तूने लगाया होता

सोच का रंग प्यारा

मेरा मन तो 

कबसे था हुरियारा

 

अहसास की पुरवाई 

तुझे छू पाती

खोली होती अगर 

तूने अपनी आत्मा की खिड़की कभी 

तूने बंद रखे खिड़की- दरवाज़े 

महसूस ही नहीं किया कभी

जो कर पाता

तो जानता 

कि

ज़िन्दगी खुद एक ख़ुशनुमा मौसम है 

तू खोया रहा 

वक्त के मौसम में

सोचा कि लौटेगा एक दिन तू 

उसके रंग में रँगकर

मगर

सीखा भी तूने तो क्या सीखा 

वक्त के मौसम से—

मौसम की तरह बदल जाना

जबकि वह बदलना था ही नहीं, नहीं दीखा?

वह था—

एक के आने पर दूसरे का उसे 

पूरी कायनात सौंप देना 

और खुद को 

उसके लिए गुमनाम कर देना 

यही दोहराता आया है क्रम

एक दूसरे के लिए हर बार हर मौसम।

मौसमों का बदलना प्यार है—

सच्चा प्यार!

अफ़सोस 

मौसम जानता है

प्यार क्या है

इंसान को नहीं पता 

इतना जहीन होकर भी।

—0—

3-खिलता गुलाब हो तुम— रश्मि विभा त्रिपाठी

 

तुम्हारे नेह की नाज़ुक पंखुरियाँ
झर रही हैं
मन की तपती धरती पर
ज़िन्दगी के मौसम में बहार आ गई है

इन दिनों
मेरे ज़ख्मी पाँव पड़ते हैं
जहाँ- जहाँ
चूम लेता है हौले से
मेरे दर्द को
तुम्हारा मखमली अहसास—
मेरी आत्मा में घोल दिया है तुमने
अपना जो यह इत्र

क्या बताऊँ कि है कितना पवित्र!!
माथे पर तुमने जो रखा था
वह बोसा गवाह है
कि हर शिकन को मिटाता
तुम्हारा स्पर्श
पूजा का फूल है
हर मुराद फलने लगी है
नई उमंग नजर में पलने लगी है
आँखों में है तुम्हारा अर्क
महक रही हूँ मैं
वक्त का झोंका
जब भी आता है
और महक जाती हूँ मैं
नींद के झोंके में भी
अब मुझे यही महसूस होता है—
ख़ुशबू का ख़्वाब हो तुम
दुनिया के जंगल में
काँटों के बीच
खिलता गुलाब हो तुम।

—0—