पथ के साथी

Thursday, November 12, 2020

1029-तीन कविताएँ

 

सन्ध्या झा 

1-  दिवाली

दीपक की रौशनी से रोशन होगा घर द्वार

आ गया देखो दिवाली का ्त्योहार ।

घर में माँ लक्ष्मी के आने से पहले

 घर की लक्ष्मी का मान कर लेना ।

 उसका अनादर करके कहीं

  अपना अपमान कर लेना ।

 माँ लक्ष्मी तुम्हें कुछ देना भी चाहे

 तो कैसे वो दे पाएँगी

 जो घर की लक्ष्मी को हताश वे पाएँगी ।

 घर की साफ- सफाई के साथ

 मन को भी साफ कर लेना ।

 

मन के सारे द्वेष को समेट

 कहीं बाहर तुम कर देना ।

बाहर ही नहीं मन भी तुम्हारा रौशन हो

तभी सही मायनों में

माँ लक्ष्मी का आगमन हो  ।।

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  2-संघर्ष

 

संघर्ष पथ एकाकी हो

तो इसमें क्या भ्रांति हो ।

 

मुश्किलों से भरी राह हो

तो इसमें क्यों उन्माद हो।

 

 चारों ओर अंधकार हो

तो इसमें क्यों संताप हो ।

 

तू रोशनी अपने अंदर की प्रज्वलित कर

फिर रात में भी दिन सी बात हो ।

 

माना संघर्ष की जो राह है

कठोर है पर तेरी आहटों में भी तो शोर है ।

 

हर बाधा बाध्य होकर हट जाएगी

संघर्ष कर तू एक बाधा घट  जाएगी ।

संघर्ष की राह तुझे विजय तक ले जाए्गी   ।।

                                                            

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3-मैं मजदूर हूँ

             

मैं मजदूर हूँ जिसे कभी प्यार नहीं मिलता

मैं मजदूर जिसे सबका स्वीकार नहीं मिलता ।

 

मैं सृजनकर्ता हूँ पर मुझे उस पर

कभी अधिकार नहीं मिलता

धूप हो या छाँव हो मेरे लिए

एक समान हो हर क्षण कर्म

पथ पर चलकर भी मुझे कभी

विश्राम नहीं मिलता ।

 

मैं मजदूर हूँ जिसे कभी प्यार नहीं मिलता

मैं मजदूर हूँ जिसे कभी स्वीकार्य नहीं मिलता ।

 

जब देश में फैली महामारी हो

हमारे चारो ओर लाचारी हो

परिस्थितियाँ हम पर भारी हो

इस देश में हमको कहीं

आधार नहीं मिलता ।

 

मैं मजदूर हूँ मैं मजबूर हूँ

मुझे कभी प्यार नहीं मिलता

मुझे कभी स्वीकार्य नहीं मिलता।

 

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Saturday, October 17, 2020

1028-वन्दना

 हे! अम्बिके जगदम्बिके - हरिगीतिका छंद

ऋता शेखर 'मधु'

 

 हे! अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।

आद्या जया दुर्गा स्वरूपा, शक्ति का आधार हो।

 

शिव की प्रिया नारायणी, हे!, ताप हर कात्यायिनी।

तम की घनेरी रैन बीते, मात बन वरदायिनी।।।

भव में भरे हैं आततायी, शूल तुम धारण करो।

हुंकार भरकर चण्डिके तुम, ओम उच्चारण करो।

त्रय वेद तेरी तीन आँखें, भगवती अवतार हो।

हे! अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।

 

कल्याणकारी दिव्य देवी, तुम सुखों का मूल हो।

भुवनेश्वरी आनंदरूपा, पद्म का तुम फूल हो।

भवमोचिनी भाव्या भवानी, देवमाता शाम्भवी।

ले लो शरण में मात ब्राह्मी, एककन्या वैष्णवी।।

काली क्षमा स्वाहा स्वधा तुम, देव तारणहार हो।

हे अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।

 

गिरिराज- पुत्री पार्वती जब, रूप नव धर आ रही।

थाली सजे हैं धूप, चंदन, शंख ध्वनि नभ छा रही।|

देना हमें आशीष माता, काम सबके आ सकें।

तेरे चरण की वंदना में, हम परम सुख पा सकें।।

दे दो कृपा हे माँ जयंती, यह सुखी संसार हो|

हे! अम्बिके जगदम्बिके तुम, विश्व पालनहार हो।

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गीत सुनने के लिए नीचे लिखे अर्चना चावजी के नाम को क्लिक कीजिए-

        अर्चना चावजी 


 


Thursday, October 15, 2020

1027- गीतिका

 

गीतिका

डॉ. गोपाल बाबू शर्मा

1

काँटों की बन आई है


फूलों की रूसवाई है ।

 रीति नई अब नीति नई

प्रीति हुई हरजाई है ।

 अपने भी कब अपने अब ,

बस मतलब की काई है ।

 चोरी सीना जोरी भी,

कैसी बेशरमाई है ।

 इंसाँ इंसाँ के दरम्याँ ,

कितनी गहरी खाई है ।

 झूठ उड़ाए  गुलछर्रे,

सूली पर सच्चाई है ।

 आगे जाना ही होगा,

तम से छिड़ी लड़ाई है ।

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हर तरफ दायरे

झूठ के आसरे ।

 आज तो आदमी,

आदमी से डरे ।

 हैं कलश स्वर्ण के,

पर ज़हर से भरे ।

 और को दोष दें,

लोग बनते खरे ।

 प्यार तो प्यार है ,

घाव होंगे हरे ।

 ज़िन्दगी जी गए,

शान से जो मरे ।

 मिल गए धूल में,

डाल से जो झरे।

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2-जीवन के अँधेरों में-

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

 

जीवन के अँधेरों में


बाधा बने घेरों में

सभी द्वारे दीपक जलाए रखना ।

खुशियाँ ही जग को मिलें

मुस्कान के फूल खिलें

थोड़ी-सी रौशनी बचाए रखना ।

इन नयनों  की झील में

झिलमिल हर कन्दील में

प्यार के कुछ दीये , सजाए रखना ।

वही धरा का रोग हैं,

जो स्वार्थ-भरे लोग हैं

तनिक दूरी उनसे ,बनाए रखना ।

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Monday, October 12, 2020

1026-चाहत

 सविता अग्रवाल 'सवि' (कैनेडा)

 

भरोसा जो टूटा था

जोड़ रही वर्षों से....

बोलियाँ खामोश हैं

कितने ही अरसों से ...

दस्तक भी गुम है अब

बारिश के शोर में ....

अधूरे जो वादे थे

दब गए संदूकों में ...

नफरतें धो रही

प्रेम रस के साबुन से ...

चट्टानें जो तिड़क गईं

भर ना पाई परिश्रम से ...

उड़ गई जो धूल बन

ला ना पाई उम्र वही ...

नीर, जो सूख गया

लौटा ना सकी सरोवर में ...

अक्षर जो मिट गए

लिख ना पाई फिर उन्हें ...

पुष्प जो मुरझा गए

खिल ना सके बगिया में ...

पत्ते जो उड़ ग

लगे ना दरख्तों पर ...

बर्फ़ जो पिघल ग

जम ना सकी फिर कभी ...

अगम्य राहें बना ना पाई

सुगम सी डगर कभी ...

निरर्थक यूँ जीवन रहा

हुआ ना सार्थक कभी ....

फिर भी एक आस है

बढ़ने की चाह है ....

हौसले बुलंद हैं ...

चाहतें भी संग हैं ....

-0-

1025

 1-प्रीति अग्रवाल ( कनाडा)

 1. ज़िद्दी

 अनजाना शहर

मंज़िलें लापता

ख़्वाहिशें ज़िद्दी -

दर -दर घुमाएँ,

रास्ते भुलाएँ,

हमें हराएँ,

बड़ा थकाएँ,

अपनों की याद में

खूब रुलाएँ....।

काश! कोई आए -

हाथ बढ़ाए,

हमको समेटे,

प्यार जताए,

बिन माँगे दे माफ़ी,

मज़बूती से थामे,

हमें साथ अपने

वापस ले जाए !!!

       -0-

2. मील का पत्थर

 

मील के पत्थर से

रहा न गया

रुआँसा था कल तक

आज रो ही पड़ा...!

-एक तू ही अकेली

है ठहरी यहाँ

बाक़ी किसी को

है  फ़ुर्सत कहाँ..!

भागे फिरते हैं पागल- से

बस भीड़ में

जाना किसको, किधर,

ये खबर है कहाँ..!

जो मेरा ही जश्न

न मनाएँगे वो

पछतावे के सिवा

कुछ न पाएँगे वो..!

मैं तो थक गया

तू ही समझा ज़रा-

"हर लम्हा है मंज़ि

अरे नासमझ,

ये न लौटेगा फिर

इसे ज़ाया न कर।"

-0-

2-संध्या झा 

लक्ष्यभेद 

 

लक्ष्य पर नर टीका

लक्ष्य भेद कर दिखा ।

 

लक्ष्य के लिए जिया 

लक्ष्य पर तूने अपना

 सर्वस्व वार हैं दिया 

 फिर है ऐसी बात क्या ?

 जो डगमगा रहा हूँ

 तू तन में स्पंदन हैं

 और थरथरा रहा है तू 

 मनु की तू संतान हैं

 भगीरथ वंश की तू आन हैं

 तू चाहे तो पर्वत चीर दे 

 सुरसरि को धरा पर खींच ले 

 तो नाम ले एकदंत का 

 और विघ्न का तू नाश कर

 

 लक्ष्य पर नर टिका 

 लक्ष्य भेद कर दिखा ।।    

-0-