पथ के साथी

Sunday, June 14, 2020

1007


प्रीति अग्रवाल
1-अनुभूतियाँ
1.
हर लम्हा है मंज़ि, अरे बेखबर !
ये न लौटेगा फिर, इसे ज़ाया न कर !!
2.
कहाँ पहुँचने की जल्दी में मसरू थे
जो फ़ुर्सत मिली, तो अब सोचते हैं...।
3.
मेरी रूह को न बाँधो, थकोगे तुम्हीं
क्या हवाएँ  बँधी हैं या बँधेंगी कभी......!!
4.
आजमाएँगे कब, ये जो अब तक पढ़ा है
क्या इम्तिहानों में ही, ज़िंदगानी कटेगी....?
5.
यूँ पलकों पे अपनी, बिठाना सँभलके...
हमें नज़रों से गिरना, गवारा नहीं है!
6.
बातों का क्या, वो तो कोई भी सुन ले...
जो चुप्पी सुने, सच्चा साथी वही है!
7.
मेरे बारे में कुछ भी, किसी से न कहना
मुझे कोने में दिल के, तुम रखना छुपाके..।
8.
'मैं ठीक हूँ', चाहे सौ बार दोहरा लूँ.....
तुम पकड़ लोगे झूठ, तुम मुझे जानते हो!
9.
पलकों तक आए, पर छलके नहीं
लो फिर हमनें आँसू पिए आज हँसके!
10.
चलो बाँट लें, आधी-आधी सज़ाएँ...
जो बढ़ती हो, तुम मेरे हिस्से में दे दो!
11.
बहकी- बहकी है चाल, गुनगुनाता है मन
मुहब्बत की तितली ने जबसे छुआ है....!
12.
जबसे नैनों में तुमने बसेरा किया
उड़ी नींद, उसका, ठिकाना छिना....!
13.
सब्र बेशुमार!......भला क्या करूँगी?
वो जानता था- मुझको ज़रूरत पड़ेगी।
-0-
2-तख्ती- प्रीति अग्रवाल

ये कौन है,
जो दिल पे दस्तक़
दिए जा रहा है?
देखता नहीं, तख़्ती पे-
]अंदर आना मना है
लिखा है!

मैं प्यार हूँ ,.... अंधा हूँ
खुदा की रज़ा में बँधा हूँ
मैं तख्तियाँ नहीं,
धड़कनों को हूँ पढ़ता
और तेरी कह रही
तू ने मुझको पुकारा...!!
-0-

Thursday, June 11, 2020

1006


[ इस बार वसन्त आया और आतंकित करके चला गया। जीवन बेमानी हो गया। क्रूर विषाणु ने तन और मन सभी को प्रभावित किया है।  मेरी फ़ाइल में 11 जून 2013 की कमला निखुर्पा की एक कविता  सुरक्षित थी। आज के सन्दर्भ में उसी वसन्त को बुलाने का विनम्र प्रयास है। सम्पादक ]

ॠतु वसन्त तुम आओ ना…
कमला निखुर्पा

ॠतु वसन्त तुम आओ ना 
चित्र;प्रीति अग्रवाल
वासन्ती रंग बिखराओ ना!
उजड़ रही आमों की बगिया,
बौर न खिलाओ ना।
सूनी हैं वन उपवन की डालें,
कोयल को भी  बुलाओ ना!
कुछ गीत नए सुनाओ ना,
ओ वसन्त तुम आओ ना!

कहीं-कहीं ऊँचे महलों में,
जाम  बहुतेरे छलक रहे हैं…।
कहीं अँधेरी झोपड़ियों में,
दुधमुँहे भूखे  बिलख रहे है॥
कुटिया  के बुझते दीपक को तुम बनके, तेल जलाओ ना…
भूखी माँ के आँचल में तुम, दूध बन उतर आओ ना…
प्रिय वसन्त तुम आओ ना…

कोई धो रहा जूठे बर्तन,
कोई कूड़ा को बीन रहा।
पेट की आग मिटाने को,
जीवन को ही छीन रहा
काम पे जाते बच्चे के, हाथों में किताब बन आओ ना……
घना अँधियारा छाया है, तुम ज्ञान के दीप जलाओ ना…
ॠतु वसंत तुम आओ ना…।

भटक रहा अपनी मंजिल से,
मतवाला युवा नशे में गुम है।
देख फ़ट रही पिता की छाती,
हुईं माँ की आँख भी नम है।
बिखर रहे सपने घर-घर के, फ़िर से उन्हें सजाओ ना…
खो गई हैं जो मुस्कानें उनको लौटा लाओ ना !
प्रिय वसन्त तुम आओ ना…

चित्र;प्रीति अग्रवाल
देखो सरसों ने भी धरा को,
धानी चूनर ओढ़ाई है।
पीले पत्ते गिर चुके पेड़ों से,
किसलय किसलय मुस्काई है।
कली बन मानव मन में आ जाओ, फ़ूल प्रेम के खिलाओ ना!
त्रिविध बयार बहाओ ना,आकर फिर से जाओ ना
ॠतु वसंत तुम आओ ना…
प्रिय वसन्त तुम आओ ना…
-0-

Wednesday, June 10, 2020

1005

1-डॉ. सुधा गुप्ता
-एक क़ाफ़िला : नन्ही नौकाओं का ( काव्य-संग्रह,मई 1983)


1- तिनका

न जाने
कौन-सी कुघड़ी
मेरी
आँख में  तिनका पड़ा
कि
ज़िन्दगी भर
पानी बहना नहीं रुका।

तकलीफ़ , पल दो पल साथ रहे:
बहुत तड़पाती है।
ज़िन्दगी भर का साथ हो:
आदत बन जाती है
एक सीमा है
जिसे पार कर
हार अभिव्यक्ति गूँगी हो जाती है
रोता है मन बिना शब्द किए
आँख बिना कोई उलाहना दिये
आँसू बहाती है


न जाने कौन-सी कुबेला
तुमनए
मेरे मन की अँगूठी, ये अमोल रतन-जड़ा
जिसे
खोने के डर से,
आँख का लगना चुका सो चुका।
-0-


चुराकर
खिसक गया
क़ीमती सपनों की पिटारी
मन के सन्दूक से,
दीवानी ख़्वाहिशें
सिर धुनतीं,
बिलखतीं
बाल खोले
घूमती रहती हैं
उम्र के ख़ाली कमरों में
-0-
3-अनमनी शाम

अजनबी शाम
मेरी आँखों में
तुम्हारी याद का काजल
आँज,
सिरहाने
तुम्हारे गीतों का गंगाजल
रख,
दबे पाँव चली गई
कि
शायद
सो सकूँ थोड़ी देर ।

कोरा काजल किरकिराता रहा,
गीतों का जल
तकिया भिगोता रहा,
न पूछो
कैसे कटी रात ।
-0-
4-तपिश और आग

दिल के आतिशदान में
चटखती यादो !
तपिश तो ठीक है, सही जाएगी।
उफ़ ! आग ऐसी !
मत बनों बेरहम इतनी
मेरी तो दुनिया जल ही जाएगी !
-0-
5-सफ़र

सफ़र:
एक ओर ऊँची चट्टानें
दूसरी ओर
भयंकर खाइयाँ।
दूर-दूर तक ख़ौफ़नाक अँधेरे
और डरावनी परछाइयाँ।
कितना झिड़का था
तुम्हें मन !
मत चलो मेरे साथ !!
-0-
2-मुक्तक 

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
10/6/ 2020
दुनिया घिरी हुई संकट में, छाया  तन-मन पर अँधियारा ।
आँसू का दरिया उमड़ा है, लगता छूटा आज किनारा ।
मैं प्रभु तुझसे इतना  माँगूँ, तू जग को केवल सुख देना ।
सारे दुख मुझको देकरके इस जग को देना उजियारा
-0-

Tuesday, June 9, 2020

1004



हरियाली फूल मौसम
रचना श्रीवास्तव


हरियाली फूल मौसम और आसमान
मुँडेरें इनकी हैं जीवन का उपमान

धरती के मुखड़े पर
बादल की छाँव
आज देखा शहर में
हँसता एक गाँव
लौट आ घर को ,
भटके मेरे अरमान
हरियाली फूल मौसम और आसमान

नदी के आँगन फिर
उतरा आज चाँद
भागे तारे
अम्बर की खिड़की फाँद
चौखट पर इनकी
उगता नहीं अभिमान
हरियाली फूल मौसम और आसमान

इंद्रधनुष ने दिए
हवा को अपने रंग
खेतों की चूनर
लहराई उनके संग
इनके तले ही
पलते मेरे अरमान
हरियाली फूल मौसम और आसमान।   
  [ चित्र; प्रीति अग्रवाल]

Monday, June 8, 2020

1003


1-वह कागज़
डॉ. शैलजा सक्सेना

जाने कितने कागज़ रँगकर
उस कागज़ तक मैं पहुँचूँगी
जिससे तेरी खुशबू आए।

सब कुछ लिखा, झूठ लग रहा
बिना साँस की देह -सरीखा
प्राण कोई अर्थों के भर दे
ऐसा गीत कहाँ गाया है?
गला रुद्ध हो, स्वर भीगा हो
शब्दों के पाँवों विछोह की
पायल भी इतनी भारी हो,
फिर मन के व्याकुल  पनघट से
वापस नहीं कभी जा पाए।

जाने कितने कागज़ रँगकर
उस कागज़ तक मैं पहुँचूँगी
जिससे तेरी खुशबू आए॥

तुझ को गाया तो मैंने है,
पर बिन देखे झूठा गाया
अंदाज़ों के शंख बजाए
सच क्या वह स्वर, तुझ तक आया?
तर्कों, व्याख्याओं की गठरी
मंदिर-मस्जिद खूब पसारी
पर झोली में सिक्का सच का
एक कभी ना मैंने पाया।
अब तो कुछ धन, जन यह पाए।
जाने कितने कागज़ रंगकर
उस कागज़ तक मैं पहुँचूँगी
जिससे तेरी खुशबू आए॥
 -0-
2-प्यार के चहबच्चे-
डॉ.शैलजा सक्सेना


रात भर फेंकता रहा आकाश
रुई की पौनियाँ,
हवा का चरखा
कातता
तार -तार!

सवेरे ने देखा
सफेद चादरों से ढकी
धरती,
रो रही है बिलखकर..

सूरज की बिन्दियाँ
जाने कहाँ गिरा आईं .....

फिर एक नया दिन....किरणें आई,
सफेद चादर
तार-तार,

आसमान
चुप,

सूरज की बिन्दिया ने
मनुहार से देखा

धरती
के सीने पर
बह निकले
प्यार के कई चहबच्चे
-0-

Sunday, June 7, 2020

1002


1- कृष्णा वर्मा
वक़्त


ग़ज़ब का हुनरमंद है वक़्त
लम्हा-लम्हा
ख़ारिज़ करता है तुम्हें तुम से
मजाल है जो होने दे कभी
देह को इसका अहसास।
बूँद-बूँद रिसती जाती है उम्र
तुम्हारी होंद से
उस पर कमाल कि
कोई नामोनिशान नहीं टीस का।
आशाओं की सुरीली सरगम में
कब बज उठे अशंकाओं  के
बेसुरे तार
यह तो जाने वही कारसाज़।
वाह रे नागर
कभी सांत्वनाओं की थपकी देके
कर देता है उत्सवी जीवन
और कभी
ज़मीन ही निकाल लेता है
पग तल से।
जिंदगी फिर भी झूलती रहती है
पैंडुलम सी
उम्मीदों और दिलासों के बीच।
अनजाने में जीती
पल-पल हलाल होती ज़िंदगी
कब रख पाती है 
उम्र का हिसाब।

-0-
2- सत्या शर्मा 'कीर्ति'
 प्यार मुझे तुम करना ऐसे

मूँगफली के दानों हो जैसे
काजू अख़रोट भरे हो वैसे
अमरू-सा भी स्वाद मिला हो
प्यार मुझसे तुम करना ऐसे ।।

थोड़ा बादल भी  छाया हो
रिमझिम पानी भी बरसा हो
सोंधी मिट्टी की खुशबू हो जैसे
प्यार मुझसे तुम करना ऐसे ।।

भाव मनाने के न आते मुझको
रूठना भी नहीं भाता तुझको
दौड़ते - भागते रहें संग दोनों
प्यार मुझे तुम करना ऐसे।।
-0-

Saturday, June 6, 2020

1001



डॉ.सुधा गुप्ता    

1-सिसकी

बहुत देर रो-रोकर सिसकी
हलकान हो-होकर
सो जाए कोई बच्चा काँधे लगकर
तो
नींद में जैसे बार-बार
उसे सिसकी आती है
ऐसे
मुझे तेरी याद आती है
बहुत देर रो-रोकर
हलकान हो-होकर ।
-0-
2-प्यास

 एक दिन भी
अपनी मर्ज़ी का न जिया
एक मैं ही रही प्यासी
और सबने
भर-भर प्याला
छककर पिया।

होगा किसी मुट्ठी में चाँद
किसी में सूरज,
मैंने तो
साँस-साँस
बस
ज़िन्दगी का कर्ज़
चुकता किया।
एक दिन भी
अपनी मर्ज़ी का न जिया।
-0-
3-लड़ाई

शीशे पर
आती है गौरैया
बार-बार
मारती है चोंच
एक बार-दस बार-सौ बार
हज़ार बार ।
ख़ुद पर करती प्रहार-
ख़ुद से होती घायल गौरैया

अक्सर हमारी सारी ज़िन्दगी
खुद से लड़ते , चोट खाते बीतती है।
-0-

4-अँधेरी सुरंग

कितने दिन हुए
तुमसे
बिछुड़े
कितने हफ़्ते-महीने -बरस ?
सोचती हूँ
पर कुछ याद नहीं आता ।

एक अँधेरी सुरंग से गुज़र रही हूँ
जाने कब से !
गुज़रूँगी
जाने कब तक !!

कहीं
रोशनी की एऽऽऽक लकीर नहीं !
-0-
(एक क़ाफ़िला : नन्ही नौकाओं का ( काव्य-संग्रह,मई 1983)

Friday, June 5, 2020

1000


रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1-हरियाली के गीत
(30-05-1999 -आकाशवाणी-अम्बिकापुर-06-06-99, कलमकौशलजून-2001)

हरियाली के गीत
छाया; रोहित काम्बोज
मत काटो तुम ये पेड़
हैं ये लज्जावसन
इस माँ वसुन्धरा के ।
इस संहार के बाद
अशोक की तरह
सचमुच तुम बहुत पछताओगे ;
बोलो फिर किसकी गोद में
सिर छिपाओगे ?
शीतल छाया
फिर कहाँ से पाओगे ?
कहाँ से पाओगे  फिर फल?
कहाँ से मिलेगा ?
सस्य श्यामला को
सींचने वाला जल ?
रेगिस्तानों में
 तब्दील हो जाएँगे खेत
बरसेंगे कहाँ से
उमड़-घुमड़कर बादल ?
थके हुए मुसाफ़िर
पाएँगे कहाँ से
श्रमहारी छाया ?
पेड़ों की हत्या करने से
हरियाली के दुश्मनों को
कब सुख मिल पाया ?
यदि चाहते हो
आसमान से कम बरसे आग
अधिक बरसें बादल ,
खेत न बनें मरुस्थल,
ढकना होगा वसुधा का तन
तभी कम होगी
गाँव नगर की तपन ।
उगाने होंगे अनगिन पेड़
बचाने होंगे
दिन- रात कटते हरे- भरे वन ।
तभी हर डाल फूलों से महकेगी
फलों से लदकर
नववधू की गर्दन की तरह
झुक जाएगी
नदियाँ खेतों को सींचेंगी
सोना बरसाएँगी
दाना चुगन की होड़ में
चिरैया चहकेगी
अम्बर में उड़कर
 हरियाली के गीत गाएगी
-0-
2-आग
(20/10/1990- आकाशवाणी अम्बिकापुर-31-7-1998)

मत जलाओ
इस शाखा को
हम बैठगे भला कहाँ पर
जब लौटेंगे रोज़ सफ़र से
नीड़ कहाँ पर होगा अपना
झूलेगा फिर
सुबह-शाम को
कलरव कैसे
जले ठूँठ पर ।
          कैसे खेलेंगे
          आँख मिचौनी
          नन्हे बच्चे
अपत डार पर
         
छाया; रोहित काम्बोज
गीत नहीं
          गाएँगे जब हम
          कैसे होगी संझा -बाती
          और करेगा कौन आरती
धूप जलाकर,
बजाकर
जब
हम साधेंगे चुप्पी
कौन जाएगा
नदी नहाने
कौन पुकारेगा
सूरज को
भरे गले से
भीगे स्वर में
जागेंगी फिर
कहाँ ॠचाएँ
हर अन्तर में ।
मत जलाओ
इस शाखा को
क्योंकि,
क्या बचेगा
इसके यूँ जल जाने पर-
न नीड़
न आँख-मिचौली
न आरती
न यह सूरज
और न गीली ॠचाएँ।
-0-

3- परहेज़
प्रीति अग्रवाल

परहेज़ तो पहले भी
करते थे लोग
कभी जात के नाम पर
कभी प्रांत के नाम पर
कभी रूप रंग, तो कभी
धन-मान के नाम पर!

सोचती हूँ-
जो हुआ, अच्छा तो नहीं हुआ,
पर भेद-भाव मिटे
सब बराबर हो गए
परहेज़ सार्वजनिक
कानूनन हो गया!!
-0-