पथ के साथी

Friday, June 17, 2016

642

कृष्णा वर्मा

तुम्हें नहीं देखा कभी
घर में कुछ छूटे हुए तुम्हारे चिह्नों ने
मुझे तुमसे परिचित  करवाया
जिन्हें माँ ने यादों की तह संग
एक संदूक में रख छोड़ा था
तुम्हारे कुरते के सोने के बटन
जिनकी चमक मुझे जब-तब
कितना लुभाती रही होगी
और तुम्हारी गोदी में बैठ मुझे
खिलौने का- सा आनन्द देते रहे होंगे
तुम्हारा धूप का काला
जिसे कई बार मेरे नन्हें हाथों ने
उतार लेने की ज़िद्द की होगी
तुम्हारी हाथ- घडी, पेन,
कमीज़ों के कफ लिंक्स जिन पर लिखा
मेड इन इंगलैंड स्पष्ट करता है
तुम्हारे शौकीन मिज़ाज़ को
माँ और तुम्हारे पवित्र रिश्ते की निशानी
वह शादी की अँगूठी आज भी
ज्यों की त्यों सहेज रखी है
तुम्हारे कपड़े जूते शायद किसी ज़रूरतमंद
पिता की ज़रूरत को पूरा करने के लिए
दान के रूप में दे दिए गए होंगे
सिल्क जौरजेट की सुन्दर रंग-बिरंगी साड़ियाँ
जो तुम कभी प्यार से माँ के लिए लाए होगे
उदासी ओढ़े पड़ी हैं संदूक में
माँ ने तुम्हारी गुमसुम यादें
उनमें लपेट आज तक सन्दूक में
कपड़ों की तहों के सबसे नीचे दबा कर रखी हुई हैं;
क्योंकि उन रंगों को पहनने का हक
जो तुम माँ से छीन  ले गए हो अपने साथ
और दे गए श्वेत शांत दूधिया  रंग ओढ़ने को
जो बेरंग जीवन के लम्बे रास्तों को
अकेले ही तय करने का अहसास दिलाता  रहे
तुम्हारी प्रीत की दो निशानियाँ  हैं उसके पास
जिनमें तुम्हारे ढब और शील झलकते हैं
अदृश्य से आज भी जीवित हो तुम 
माँ के इर्द-गिर्द।
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Wednesday, June 15, 2016

641



ज़िंदगी मुस्काएगी-डॉ योगेन्द्र नाथ शर्मा 'अरुण'

ज़िन्दगी उलझाओगे तो,बस उलझती जाएगी!
मुस्कुराओगे अगर तुम,ये ज़िंदगी मुस्काएगी!!

मुश्किलें आएँगी हरदम,बस जूझना होगा तुम्हे,
जितना मुश्किल से डरोगे,उतना ही ये डराएगी!!

मंजिल स्वयं आती नहीं,ये खूब रखना याद तुम,
जब पाँव चलते जाएँगे,मंजिल स्वयं आ जाएगी!!

जिस ने भी डर के छोड़ दी है, डोर आशा की यहाँ,
कोई दवा उसको कभी, जीवित नहीं कर पाएगी!!

पाँव  से विकलांग है गर, तो  दोष  तेरा  है कहाँ?,
साहस जुटाले दिल में तू,मंजिल तेरी मिल जाएगी!!

सब को ही जाना है एक दिन, कौन रहता है यहाँ?
उपकार कर लेगा अगर, तो  याद  जग को आएगी!!
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डॉ योगेन्द्र नाथ शर्मा "अरुण"
पूर्व प्राचार्य,
74/3,
न्यू नेहरु नगर,
रूडकी-247667